ट्रेन के वाशरूम में नेहा को चोदा
सूरत से निकली रात की ट्रेन में नेहा ने खुद बुलाया—गलियारा अंधेरा है, साथ चलोगे। वाशरूम में कुंडी लगते ही टॉप ऊपर, ब्रा खोलकर भारी स्तन मुँह में लिए, जींस खींचकर गीली पैंटी फाड़ दी। दो उँगलियाँ चूत में घुसाईं तो पानी बहने लगा, फिर लंड निकालकर एक झटके में जड़ तक ठोक दिया। ट्रेन के हर धक्के के साथ कूल्हे पकड़कर पीछे से पीटा, चोटी खींचकर गर्दन काटी, गोद में उठाकर दीवार से रगड़ा। नेहा दबी-दबी कराहती रही—“और अंदर… जोर से चोदो भैया।” आखिर में चूत जकड़ गई, माल पेट-जाँघों और चूत के मुँह पर उड़ेल दिया। परिवार बाहर सोता रहा, दोनों साफ निकल आए।
SEX STORIES IN HINDI
Pritam
9/1/2026
मेरा नाम प्रीतम है। मैं सूरत से अहमदाबाद जा रहा था।
रात के सवा ग्यारह बजे सूरत जंक्शन से ट्रेन निकली। स्लीपर कोच था। साइड लोअर मेरी सीट थी। बोरिंग और थैला सिरहाने रखकर मैं बैठ गया। डिब्बे में पंखे की आवाज़, ट्रेन की लय और दूर कहीं बच्चे की रोने जैसी आवाज़ मिली-जुली चल रही थी। सामने वाली बर्थ पर पूरा परिवार था। अंकल राजेश—उम्र पचास के आसपास, माथे पर पसीना, पेट थोड़ा निकला हुआ, कमीज़ के ऊपर के दो बटन खुले। आंटी साड़ी में थीं, माथा ढका हुआ, जल्दी करवट लेकर सो गईं। उनके बगल में उनकी बेटी नेहा बैठी थी।
नेहा की उम्र तेईस-चौबीस की होगी। कॉलेज खत्म करके घर लौट रही थी। गोरी त्वचा, लंबे काले बाल आधे खुले कंधों पर गिरे हुए, पतली कमर, टाइट नेवी ब्लू जींस में भरे कूल्हे और ऊपर हल्का सफेद टॉप जिसमें छातियाँ साफ उभर रही थीं। जब वह पानी की बोतल खोलती तो बाँहें ऊपर उठतीं और टॉप थोड़ा खिंच जाता। पहली नज़र में सामान्य लड़की लगी। दूसरी नज़र में उसकी आँखें बहुत देर तक एक जगह नहीं टिकती थीं।
शुरुआत में लगा सामान्य सफर होगा। अंकल ने मुझसे पूछा, “कहाँ तक जा रहे हो बेटा?” मैंने कहा अहमदाबाद। उन्होंने सिर हिलाया और अपनी बीवी को कंबल देते हुए सोने की तैयारी करने लगे। नेहा फोन चला रही थी, लेकिन बीच-बीच में ऊपर देखकर मुझसे आँखें मिलाती रही। एक बार अंकल चाय लेने गए तो उसने धीरे से पूछा, “भैया, आप भी अकेले जा रहे हो?” आवाज़ में हल्की हँसी थी। मैंने सिर हिलाया। उसने कुछ और नहीं कहा, फोन पर वापस झुक गई, लेकिन पैर जानबूझकर मेरे पैर की तरफ बढ़ा दिया। छू गया। माफी माँगी। आँखें नहीं हटाईं।
रात बढ़ती गई। डिब्बे की रोशनी धीमी कर दी गई। ज्यादातर लोग सो चुके थे। पंखे की आवाज़ और पटरियों की लय एक जैसी चल रही थी। नेहा दुपट्टा ठीक करती रही, पानी पीती रही, करवट बदलती रही। हर बार उसका शरीर थोड़ा मेरी तरफ आता। एक बार उसने फोन गिराया। झुककर उठाने गई तो टॉप और आगे खिंच गया। उसने देखा कि मैं देख रहा हूँ। मुस्कुराई, कुछ नहीं कहा।
करीब बारह बजकर बीस मिनट हुए होंगे जब उसने दुपट्टा ठीक करते हुए बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “मुझे वाशरूम जाना है। गलियारा अंधेरा है… साथ चलोगे?” आँखों में वही चमक थी जो पूरे सफर में मैं देख रहा था। मैं समझ गया था कि यह सिर्फ वाशरूम की बात नहीं। मैं उठा। वह मेरे आगे-आगे चली। गलियारे में हल्की पीली रोशनी थी। एक आदमी दूर खड़ा सिगरेट पी रहा था, पीठ हमारी तरफ थी। नेहा ने वाशरूम का दरवाजा खोला, अंदर गई, फिर गर्दन घुमाकर मुझे देखा। मैं अंदर गया। उसने दरवाजा बंद किया और कुंडी लगा दी।
जगह बहुत छोटी थी—सिंक, टॉयलेट और मुश्किल से दो लोगों के खड़े होने की जगह। ट्रेन हिल रही थी। शीशे पर हल्की भाप पहले से थी। दरवाजा बंद होते ही उसने मेरी तरफ मुड़कर कहा, “तुम जानते हो ना मैं क्या चाहती हूँ…” आवाज़ फुसफुसाहट से ज़्यादा नहीं थी।
मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे दीवार से सटा दिया। उसके होंठ मुलायम और थोड़े नम थे। जब मैंने चूमा तो उसने जोर से जवाब दिया। जीभ अंदर तक चली गई। उसके हाथ मेरे बालों में उलझ गए। मैंने टॉप ऊपर कर दिया। ब्रा के नीचे गोल, भारी स्तन थे, निप्पल पहले से कड़े। एक को मुँह में लिया, धीरे-धीरे चूसा, दाँत से हल्के से काटा। नेहा की कमर लचक गई। “और जोर से…” उसने कान में कहा। दूसरी छाती भी उसी तरह ली। उसके हाथ मेरे सिर को और पास खींच रहे थे।
जींस का बटन खोला, नीचे खींचा। पैंटी पहले से गीली थी, बीच में गहरा निशान। दो उँगलियाँ अंदर गईं—इतनी गीली थी कि आसानी से घुस गईं। अंदर-बाहर किया, क्लिट पर अंगूठे से गोलाकार दबाव दिया। नेहा ने मुँह मेरे कंधे पर दबा लिया ताकि आवाज़ बाहर न जाए। टाँगें काँप रही थीं। उँगलियाँ और तेज कीं। उसकी साँस गर्दन पर गर्म हो रही थी।
उसे घुमाया और सिंक की तरफ झुका दिया। पीछे से जींस और पैंटी पूरी उतार दी। गोरे, गोल चूतड़ सामने थे। लंड निकाला—पहले से सख्त, नसों से भरा। सिरे को उसकी गीली चूत पर रगड़ा, ऊपर-नीचे किया, फिर एक झटके में अंदर तक धकेल दिया। नेहा ने दबी हुई कराह निकाली। ट्रेन की हरकत के साथ लंड और गहराई तक चला जा रहा था। कूल्हे पकड़कर जोर-जोर से ठोके लगाने शुरू किए। हर धक्के पर छातियाँ सिंक से टकरा रही थीं। एक हाथ आगे बढ़ाकर स्तन मसल रहा था, दूसरा कमर पर कसकर था।
“हाँ… और अंदर… जोर से करो भैया…” वह फुसफुसा रही थी। छोटी जगह में सिर्फ साँसें, शरीर की टक्कर और ट्रेन के झटके थे। चोटी पकड़कर सिर पीछे खींचा, गर्दन पर दाँत गड़ा दिए। चूत इतनी टाइट थी कि हर बार निकलते समय कसकर जकड़ लेती थी। रफ्तार बढ़ा दी—
तेज, गहरे, लगातार ठोके। जाँघें काँप रही थीं। सिंक पर उसकी हथेलियाँ फिसल रही थीं।
उसे घुमाया, गोद में उठा लिया। टाँगें कमर के चारों ओर लिपट गईं। इस पोजीशन में लंड और अंदर तक जा रहा था। नाखून पीठ पर चल रहे थे। आँखें बंद, होंठ काटे हुए। दीवार से उसकी पीठ रगड़ रही थी। फिर मैं बैठ गया जितना उस छोटी जगह में बैठ सकते थे, वह ऊपर सवार हो गई। हाथ कंधों पर रखे और खुद उछलने लगी। स्तन चेहरे के सामने झूल रहे थे। दोनों को बारी-बारी मुँह में लिया। हरकतें तेज होती गईं। शीशा अब पूरी तरह भाप से भर चुका था।
अचानक शरीर में तेज कंपन हुआ। चूत ने लंड को बार-बार जकड़ा, गर्म तरल बहने लगा। पहले चरम पर पहुँची, दबी चीख निकालते हुए। मैं रुका नहीं। और जोर से उठा-गिराया। कुछ और गहरे धक्कों के बाद मैं भी सीमा पर पहुँचा। लंड बाहर निकाला, पेट, जाँघों और चूत के आसपास गरम वीर्य गिरा दिया। कुछ बूँदें चूत के मुँह पर भी लग गईं।
कुछ देर वहीं खड़े रहे। साँसें सामान्य करने की कोशिश करते। ट्रेन एक स्टेशन पर धीमी हुई, फिर फिर चल पड़ी। नेहा ने टिशू से खुद को साफ किया, पैंटी और जींस पहनी, टॉप नीचे किया, बाल संवारे। दरवाजा खोलने से पहले मेरी आँखों में देखा और कहा, “किसी को पता नहीं चलना चाहिए… बिलकुल नहीं।” आवाज़ में डर और संतुष्टि दोनों थे। मैंने सिर हिलाया। वह पहले निकली। मैं दो मिनट बाद। गलियारे में वह सिगरेट वाला आदमी नहीं था। कोई नहीं था।
डिब्बे में वापस आकर दोनों अपनी जगह बैठ गए जैसे कुछ हुआ ही न हो। अंकल खर्राटे ले रहे थे। आंटी करवट बदल रही थीं। नेहा बर्थ पर लेट गई, कंबल ओढ़ा, एक बार आँखें मिलाईं और हल्की मुस्कान दी। फिर मुँह दूसरी तरफ कर लिया। मैं साइड लोअर पर बैठकर पानी पिया। हाथ अभी भी हल्के काँप रहे थे। ऊपरी बर्थ पर लेट गया। नींद नहीं आई। वाशरूम की गंध, उसकी गीली गर्माहट, दबी कराहें और ट्रेन के झटके के साथ लगे ठोके बार-बार याद आ रहे थे।
सुबह ट्रेन अहमदाबाद के पास पहुँची। रोशनी बढ़ गई। नेहा सामान बाँध रही थी, बाल बाँध रही थी, चेहरा सामान्य था जैसे रात कुछ हुआ ही न हो। अंकल चाय माँग रहे थे। जाते-जाते नेहा ने एक बार पीछे मुड़कर देखा। कोई शब्द नहीं कहा। प्लेटफॉर्म पर उतरते समय हमारे कंधे हल्के से छू गए। भीड़ में वह परिवार आगे निकल गया।
उस रात के बाद जब भी सूरत-अहमदाबाद की ट्रेन में बैठता हूँ, वाशरूम के पास से गुजरते समय वही यादें ताजा हो जाती हैं—छोटी जगह, ट्रेन की रफ्तार, उसकी टाइट चूत और वो काम जो किसी को पता नहीं चला। मैंने अपना काम कर लिया था। चुपके से। जोर-जोर से। और साफ निकल आया था।