वरसात की रात खेत में ससुर की नौ इंच मोटी लंड से भीगी अधूरी बहू

सात साल की शादी और अभी भी खाली पेट। पति मुंबई में, साल में एक-दो बार आता है और जल्दी थक जाता है। सीमा की भूख कभी नहीं भरती। छप्पन साल के बाबूजी का मजबूत शरीर और लूंगी में छिपा नौ इंच का मोटा लंड… एक बरसाती रात खेत के रास्ते पर बिजली कड़की और सीमा की नंगी चूत सीधे उनके लंड से चिपक गई। आम के पेड़ के नीचे पानी-मिट्टी में जो चुदाई हुई… वो रात सुनकर तुम भी भीग जाओगे। पूरी कहानी अभी सुनो।

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बाबूजी

7/18/2026

नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम सीमा है। उम्र तीस साल। सूरत जिले के एक छोटे से गाँव में रहती हूँ। शादी को पूरे सात साल हो चुके हैं, लेकिन पेट में अभी तक कोई हलचल नहीं हुई। पति मुंबई में रहता है। साल में एक बार, कभी-कभी दो बार आता है। आता है तो तीन-चार दिन रुकता है। उन तीन-चार दिनों में भी मेरी भूख पूरी नहीं होती। उसका लंड छोटा है, जल्दी ढीला पड़ जाता है, और फिर वो सो जाता है। मैं अधूरी रह जाती हूँ। रात भर करवटें बदलती हूँ। शरीर में आग सुलगती रहती है।

सासू माँ कई साल पहले चल बसीं। बाबू जी अकेले खेती संभालते हैं। छप्पन साल के हैं, लेकिन शरीर अभी भी मजबूत है। लंबा-चौड़ा कद, चौड़े कंधे, मेहनत से बने हुए सख्त हाथ। खेत में काम करते-करते उनका शरीर पसीने से चमकता है। मैं कई बार उन्हें नहाते हुए देख चुकी हूँ। लूँगी के अंदर का उभार… नौ इंच लंबा और मोटा। देखकर मेरे अंदर कुछ हिल जाता था। शर्म भी आती थी, लेकिन नजर नहीं हटती थी।

मैं सावली हूँ। चेहरा साधारण है, लेकिन शरीर ठीक है—बूब्स भरे हुए, कमर पतली, गांड गोल और कसी हुई। पिछले एक साल से मैं जानबूझकर बाबू जी के सामने थोड़ा ज्यादा खुली रहने लगी थी। नहाने के बाद सिर्फ तौलिया लपेटकर रसोई में आ जाती। चाय बनाते वक्त तौलिया थोड़ा सरक जाता तो मैं ठीक करने की जल्दी नहीं करती। साड़ी का पल्लू ढीला रखती। कभी-कभी पीछे से खुले ब्लाउज में उनके सामने खड़ी हो जाती। बाबू जी कुछ कहते नहीं थे। बस उनकी नजरें रुक जातीं। कभी-कभी वो अपना मुँह दूसरी तरफ कर लेते, लेकिन फिर वापस देख लेते।

रात को अकेली सोते हुए मैं अक्सर अपने हाथों से खुद को छूती थी। आँखें बंद करके बाबू जी का चेहरा याद करती। उनके मोटे लंड की कल्पना करती। शरीर काँप उठता। पानी निकल आता। फिर शर्म से अपना मुँह ढक लेती। सुबह उठकर सामान्य बनने की कोशिश करती। लेकिन अंदर की आग बुझती नहीं थी।

एक शाम की बात है। बाबू जी खेत से लौटे तो बोले, “बहू, रात को खेत पर जाना पड़ेगा। कुछ काम अधूरा रह गया है। देर हो सकती है।”

मैंने तुरंत कहा, “मैं भी चलूँगी बाबू जी। अकेले रात में डर लगता है।”

वो थोड़ी देर चुप रहे। फिर बोले, “ठीक है। लेकिन वहाँ बैठे-बैठे क्या करेगी?”

“जो होगा, देख लेंगे।”

मैंने जल्दी-जल्दी खाना बनाया। दोनों ने खाया। फिर निकल पड़े। खेत गाँव से काफी दूर था। साइकिल से गए। मैं आगे वाली डंडी पर बैठी। बाबू जी ने सिर्फ बनियान और लूँगी पहनी थी। अंदर कुछ नहीं। मैंने साड़ी पहनी थी, अंदर ब्रा-पैंटी कुछ नहीं। साइकिल के हर झटके से उनकी मजबूत जाँघें मेरी गांड से टकरा रही थीं। उनकी छाती मेरी पीठ से चिपक रही थी। मेरा ब्लाउज पीछे से खुला था। हवा लग रही थी। उनके साँस की गर्मी मेरी गर्दन पर पड़ रही थी।

आधे रास्ते पर अचानक आसमान काला हो गया। जोर की बारिश शुरू हो गई। हम दोनों भीगने लगे। बाबू जी ने साइकिल एक तरफ खड़ी की और हम एक बड़े आम के पेड़ के नीचे खड़े हो गए। अंधेरा गहरा था। चारों तरफ सन्नाटा। सिर्फ बारिश की आवाज। ठंड लगने लगी। और मुझे जोर से पेशाब भी आ गया।

“बाबू जी…” मेरी आवाज काँप रही थी, “मुझे बहुत जोर से आ रहा है।”

वो बोले, “यहीं कर ले बहू। आगे अंधेरा है। साँप-बिच्छू का डर।”

मैं दो-तीन कदम दूर गई। साड़ी ऊपर की और बैठ गई। फुस्स… फुस्स… की आवाज में मूतने लगी। बाबू जी दूसरी तरफ मुड़े थे, लेकिन मैंने तिरछी नजर से देख लिया। उनकी लूँगी थोड़ी ऊपर उठी हुई थी। उनका लंड बाहर निकला हुआ था। मोटा, लंबा, और मूत की धार छोड़ रहा था। देखकर मेरी साँस रुक गई। तभी आसमान में जोर से बिजली कड़की। रोशनी इतनी तेज थी कि पल भर के लिए सब कुछ साफ दिख गया। मैं डर के मारे चीखते हुए सीधी बाबू जी से चिपक गई।

हलचल में उनकी लूँगी खुलकर नीचे गिर गई। मेरी नंगी चूत उनके आधे खड़े लंड से चिपक गई। मैं काँप रही थी। शरीर से पानी टपक रहा था। बाबू जी के हाथ खुद-ब-खुद मेरी पीठ पर आ गए। पहले सिर्फ सहला रहे थे। फिर कमर पर। फिर धीरे-धीरे नीचे सरककर मेरी गोल गांड को थाम लिया। उनके हाथों की गर्मी मेरे गीले शरीर पर पड़ रही थी।

“डर गई?” उनकी आवाज भारी हो गई थी।

“हाँ… बिजली की आवाज से… मेरा तो रुक भी गया…”

फिर से जोर की कड़क हुई। डर के मारे खड़े-खड़े ही मेरा बाकी का मूत निकल गया—सीधा उनके लंड पर। गरम-गरम पानी उनके लंड को नहला रहा था। बाबू जी की साँस भारी हो गई। उनकी उंगलियाँ मेरी गांड की दरार पर रुक गईं।

“ठंडे पानी में भी… तेरा ये गरम… अजीब लग रहा है बहू…”

उनकी भी धार छूट गई। दोनों का पानी मिल रहा था। गरम और ठंडा एक साथ। मैं सिसक उठी। पैर फिसले और मैं उछलकर उनकी गोद में चढ़ गई। दोनों टाँगें उनकी कमर से लिपट गईं। मेरी चूत ठीक उनके लंड के ऊपर बैठ गई। बाबू जी के दोनों हाथ मेरी गांड पर आ गए। एक उंगली धीरे से दरार में घुस गई।

मैंने आह भरी। “बाबू जी…”

वो कुछ नहीं बोले। सिर्फ उंगली और अंदर ले गए। मैं उनकी उंगली पर अपनी गांड धीरे-धीरे घुमाने लगी। मेरी चूत से पानी निकल रहा था। उनके लंड को गीला कर रहा था। बाबू जी ने मुझे धीरे से नीचे उतारा। साड़ी के पल्लू को खींचकर खोला। फिर ब्लाउज के हुक खोले। बनियान उतारी। दोनों नंगे हो गए। बारिश अभी भी पड़ रही थी। हम दोनों मिट्टी और पानी से सने हुए थे।

बाबू जी ने मुझे पेड़ के तने से सटा दिया। उनके मोटे लंड ने मेरी जाँघों के बीच जगह बनाई। वो रगड़ रहे थे। मेरे बूब्स को अपने हाथों में लेकर दबा रहे थे। निप्पल को अंगूठे से रगड़ रहे थे। मैं उनकी छाती से चिपक गई। उनके सीने के बाल मेरे गीले बूब्स से चिपक रहे थे।

“अंदर…” मैंने फुसफुसाया।

वो रुके। मेरे चेहरे को देखा। फिर अपने लंड को मेरी चूत के मुँह पर लगाया और धीरे से धक्का दिया। आधा अंदर गया। मैंने दाँत भींच लिए। दर्द हुआ। लेकिन साथ में एक अजीब सी राहत भी। बाबू जी ने फिर धक्का दिया। पूरा अंदर चला गया। मेरी चूत फैल गई। बाबू जी कुछ देर रुके। फिर धीरे-धीरे हिलने लगे।

बारिश की आवाज में चाप-चाप की आवाज मिल रही थी। बाबू जी के हाथ मेरी गांड पर थे। वो मुझे अपनी तरफ खींच-खींचकर पेल रहे थे। मैं उनकी गर्दन से लिपट गई। उनके कान के पास साँस छोड़ रही थी।

थोड़ी देर बाद उन्होंने गति तेज कर दी। मेरी पीठ पेड़ की छाल से रगड़ खा रही थी। बूब्स उनके सीने से दब-दबकर फैल रहे थे। मैं अपनी टाँगें और कस लीं। लंड और गहराई तक जा रहा था।

“जोर से…” मेरी आवाज निकल गई।

बाबू जी ने और जोर लगाया। उनकी जाँघें मेरी जाँघों से टकरा रही थीं। पानी और पसीना मिलकर बह रहा था। अचानक उन्होंने लंड बाहर निकाला। मुझे घुटनों के बल बिठा दिया। खुद पीछे आ गए। फिर से अंदर घुसा दिया। इस बार और गहरा। मैंने दोनों हाथ जमीन पर टिका दिए। बाबू जी पीछे से पकड़कर पेलने लगे। एक हाथ मेरी कमर पर, दूसरा मेरे एक बूब्स पर।

मैं अपनी गांड पीछे की तरफ धकेल रही थी। हर धक्के के साथ आह निकल रही थी। बाबू जी कभी धीमे करते, कभी तेज। मेरी चूत पूरी तरह खुल चुकी थी। पानी निकल-निकलकर उनकी जाँघों पर लग रहा था।

थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर लंड निकाला। मुझे घुमाया। अब मैं उनकी गोद में बैठ गई। उनके लंड पर खुद को बैठा लिया। दोनों हाथ उनके कंधों पर रखे। ऊपर-नीचे होने लगी। बाबू जी मेरे बूब्स को मुँह में ले रहे थे। चूस रहे थे, दाँतों से हल्के से काट रहे थे। मैं उनके बालों में उंगलियाँ फँसाए हुए उछल रही थी।

बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। हम दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। मिट्टी हमारे शरीर पर चिपक रही थी। बाबू जी ने मुझे फिर नीचे लिटा दिया। इस बार मेरी टाँगें उनके कंधों पर थीं। लंड सीधा और गहराई तक जा रहा था। मेरी आँखें बंद थीं। सिर्फ अहसास था—भरपूर, गरम, और तेज।

अचानक बाबू जी की साँस और तेज हो गई। उन्होंने जोर से धक्के दिए और अंदर ही झड़ गए। गरम माल मेरी चूत में भर गया। मैं भी पहुँच गई। शरीर काँप उठा। पैर अकड़ गए। कुछ देर हम वैसे ही पड़े रहे। बारिश हमारे ऊपर पड़ रही थी।

फिर बाबू जी उठे। मुझे उठाया। दोनों ने अपने-अपने कपड़े समेटे। साइकिल पर बैठकर घर की तरफ चल दिए। रास्ते भर कोई नहीं बोला। सिर्फ साँसें चल रही थीं।

घर पहुँचे तो दोनों भीगे हुए थे। बाबू जी ने दरवाजा बंद किया। मैंने गीली साड़ी उतारी। बाबू जी ने अपनी लूँगी। हम दोनों फिर से नंगे थे। इस बार बिना किसी जल्दबाजी के। बाबू जी ने मुझे खाट पर लिटाया। खुद मेरे ऊपर आ गए। इस बार चुदाई धीमी थी। गहरी थी। उनके होंठ मेरे गले पर, मेरे बूब्स पर घूम रहे थे। लंड अंदर-बाहर हो रहा था। मैं उनकी पीठ पर नाखून चला रही थी।

रात में हमने दो बार और किया। एक बार खाट पर, एक बार आँगन में चटाई बिछाकर। बाबू जी की ताकत अभी भी जवान थी। उन्होंने मुझे थका दिया। आखिर में मैं उनके सीने पर सिर रखकर सो गई।

उस रात के बाद हमारी मिलना जारी रही। कभी खेत के कोने में, कभी दोपहर को बाथ में, कभी रात को जब गाँव सो जाता। बाबू जी मुझे धीरे-धीरे समझ गए थे। कहाँ छूने से मेरी साँस रुक जाती है, कहाँ जोर लगाने से मैं और गीली हो जाती हूँ। मैं भी उनके शरीर को जान गई थी।

कुछ महीनों बाद मेरा पेट फूलने लगा। डॉक्टर ने पुष्टि कर दी—मैं माँ बनने वाली हूँ।

अब सबके सामने मैं उस बच्चे को अपने पति का नाम देती हूँ। गाँव वाले बधाई देते हैं। पति फोन पर खुश होता है। लेकिन सच्चाई सिर्फ मैं और बाबू जी जानते हैं। मेरे अंदर का तगड़ा शरीर और मेरा बेटा… दोनों बाबू जी के हैं।

और अजीब बात ये है कि मैं पछताती नहीं हूँ। उस बरसात वाली रात को याद करके आज भी शरीर में सिहरन हो जाती है।