विमल के बंडल की लालच में खेत की मजदूर लड़की की पूरी चुदाई

गरीब मजदूर सुनीता रोज खेत में घास काटती थी। पतली साड़ी, पसीने से भीगे दूध और भूखे पेट के साथ। मालिक ने पहले एक पैकेट विमल दिया, फिर पूरा बंडल। पहले उसने मना किया, इज्जत की बात की, रोई भी। लेकिन बंडल की लालच और भूख ने उसे छप्पर तक खींच लिया। वहाँ मालिक ने उसके दूध चूसे, चूत चाटी और कुँवारी झिल्ली एक ही धक्के में फाड़ दी। अब वो खुद बोलती है — “मालिक, और गहरा डालो… विमल रोज देना।”

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Raju

8/12/2026

मैं राजू, उम्र पच्चीस, हमारे गाँव के बड़े खेत का मालिक हूँ। बाप के मरने के बाद सारा काम मेरे सिर पर आ गया था। दस बीघा खेत, चार मजदूर और एक लड़की। उस लड़की का नाम सुनीता था। उम्र बीस-इक्कीस के आसपास। गाँव के किनारे झुग्गी में रहती थी। बाप शराबी, माँ बीमार, छोटा भाई स्कूल जाता था। सुनीता सुबह से शाम तक हमारे खेत में काम करती। गेहूँ निकालना, घास काटना, पानी देना—सब।

पहली बार मैंने उसे करीब से देखा था जब मैं खेत का निरीक्षण करने गया। वो घुटनों के बल बैठी हुई घास काट रही थी। पतली साड़ी कमर में बाँधी हुई, ऊपर की ब्लाउज फटी हुई। पसीने से भीगी ब्लाउज उसके दूधों पर चिपक रही थी। गोल-गोल बड़े दूध साफ दिख रहे थे। पतली कमर, गोल चूतड़ और जब वो झुकती तो साड़ी के नीचे से जाँघों की सफेदी नजर आ जाती। चेहरा काला-सा पर आँखें बड़ी-बड़ी। होंठ गुलाबी।

मैंने सोचा—साली इतनी गरीब है, कोई पति नहीं, कोई सहारा नहीं। अगर थोड़ी सी मदद करूँ तो शायद... लेकिन मैंने खुद को रोका।

मैं उसके पास गया। “सुनीता, पानी पी ले। धूप बहुत तेज है।”

वो उठकर खड़ी हो गई। सिर नीचे झुकाए बोली, “जी मालिक। धन्यवाद।”

मैंने पानी की बोतल दी। उसकी उंगलियाँ मेरे हाथ से छू गईं। नरम थीं। मेरे लंड में हलचल हुई। मैंने मुंह फेर लिया।

उस दिन शाम को घर आकर मैंने मुठ मारी। सुनीता के दूध, उसकी गीली साड़ी, उसके चूतड़—सब याद करके। माल निकलते वक्त मैंने सोचा था—एक दिन जरूर।

दूसरे दिन फिर गया। वो अकेली खेत के कोने में घास काट रही थी। बाकी मजदूर दूर थे। मैं पास जाकर बैठ गया। “सुनीता, घर का क्या हाल है? बाप तो शराब पीता ही रहता होगा।”

वो चुप रही। फिर धीरे से बोली, “मालिक, घर की बात मत पूछो। दिनभर काम करके रात को रोटी भी मुश्किल से मिलती है।”

मैंने जेब से विमल का एक छोटा पैकेट निकाला। गाँव में विमल का चलन बहुत था। गरीब लोग इसके बिना नहीं रह सकते थे। “ले, ये ले ले। थोड़ी सी राहत मिलेगी।”

वो हैरान होकर देखने लगी। “मालिक... ये... मैं नहीं ले सकती। बाप को पता चल गया तो...”

“बाप को बताने की जरूरत नहीं। चुपके से रख ले। तेरे काम के लिए इनाम है।”

वो झिझकी। फिर हाथ बढ़ाकर ले लिया। “धन्यवाद मालिक।”

मैंने उसकी आँखों में देखा। वो झट से नजरें चुरा ली। उस दिन भी शाम को मुठ मारी। इस बार ज्यादा जोर से। सोचा—धीरे-धीरे काम बनेगा।

तीसरे दिन मैंने जानबूझकर देर तक खेत में रुका। सुनीता पानी भरने गई थी। कुएँ के पास अकेली थी। मैं पीछे से गया। “सुनीता...”

वो चौंक गई। पानी की बाल्टी लगभग गिर गई। “मालिक... आप... इधर?”

“तुझे देख रहा था। बहुत मेहनत करती है तू। थक तो नहीं गई?”

वो मुस्कुराई। पहली बार मुस्कुराई। “मालिक, गरीब की मेहनत कभी खत्म नहीं होती।”

मैंने फिर विमल का बंडल निकाला। इस बार पूरा बंडल। दस पैकेट। “ये ले। आज का इनाम। घर ले जाके बाप को मत दिखाना। खुद खा ले या बेच ले। पैसे आ जाएंगे।”

वो बंडल देखकर आँखें फाड़कर रह गई। “मालिक... इतना... क्यों?”

“क्योंकि तू अच्छी है। मेहनती है। और...” मैंने रुककर कहा, “तुझे देखकर अच्छा लगता है।”

वो शरमा गई। गाल लाल हो गए। “मालिक... ऐसी बातें... ठीक नहीं। मैं... मैं गरीब हूँ। आप बड़े आदमी हो।”

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। नरम हाथ। “गरीब-अमीर का क्या। दिल तो एक ही है।”

वो हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी लेकिन मैंने पकड़े रखा। “मालिक... छोड़ दो... कोई देख लेगा...”

मैंने छोड़ दिया। वो भाग गई। लेकिन उस शाम जब वो घर जा रही थी तो मैंने देखा—उसके हाथ में विमल का बंडल था।

रात को मैंने फिर मुठ मारी। इस बार सुनीता के होंठ, उसके दूध, उसकी चूत की कल्पना करके। माल इतना निकला कि चादर गीली हो गई।

चौथे दिन मौसम खराब था। बादल छाए हुए थे। बाकी मजदूर घर चले गए। सिर्फ सुनीता रह गई। गेहूँ के ढेर के पास बैठी घास छाँट रही थी। मैं पास गया। “सुनीता, आज अकेली है तू?”

वो सिर उठाकर बोली, “जी मालिक। बाकी चले गए। मैं थोड़ा और काम निपटा लूँ।”

मैं उसके बगल में बैठ गया। “तू बहुत सुंदर लगती है जब काम करती है।”

वो शरमाई। “मालिक... मजाक मत करो।”

“मजाक नहीं। सच कह रहा हूँ। तेरे दूध कितने गोल हैं। साड़ी में छिपे हुए भी दिख जाते हैं।”

वो एकदम से खड़ी हो गई। “मालिक... ये क्या बातें कर रहे हो? मैं... मैं ऐसी लड़की नहीं हूँ।”

मैंने भी खड़े होकर उसका हाथ पकड़ लिया। “सुनीता... सुन। मैं तुझे सिर्फ काम वाली मजदूर नहीं समझता। तू... तू मुझे अच्छी लगती है। बहुत।”

वो काँप रही थी। “मालिक... छोड़ दो... मेरी इज्जत... घर वाले...”

“इज्जत की बात बाद में। अभी तो सिर्फ बात कर रहे हैं। विमल का बंडल तो ले ही लिया था तू। और भी चाहिए तो बोल।”

वो चुप हो गई। आँखों में पानी आ गया। “मालिक... मैं गरीब हूँ। मुझे लालच मत दीजिए। बाप शराबी है। अगर किसी ने देख लिया तो...”

मैंने उसका गाल सहलाया। “कोई नहीं देखेगा। खेत खाली है। बादल छाए हैं। आ जा मेरे पास।”

वो पीछे हटी। “नहीं... नहीं मालिक। ये गलत है। मैं... मैं कुँवारी हूँ। शादी नहीं हुई।”

मेरे लंड ने जोर से धक्का मारा। कुँवारी। और भी मजा आएगा। “कुँवारी हो तो क्या। पहली बार तो किसी न किसी के साथ होती है। मैं अच्छा रखूँगा।”

वो रोने लगी। “मालिक... प्लीज... मुझे जाने दीजिए। मैं काम छोड़ दूंगी। दूसरे खेत में चली जाऊंगी।”

मैंने उसे जाने दिया। लेकिन अंदर से आग लग गई थी। रात को तीन बार मुठ मारी। हर बार सुनीता के नाम पर।

पाँचवें दिन बारिश हो रही थी। हल्की-हल्की। खेत में पानी भरा था। मजदूर नहीं आए। सिर्फ सुनीता आई। भीगी साड़ी में। ब्लाउज पारदर्शी हो गया था। काले निप्पल साफ दिख रहे थे। दूध के आकार साफ।

मैं खेत के किनारे बने छोटे से फूस के छप्पर में बैठा था। जहाँ औजार रखे जाते थे। सुनीता काम करने आई तो मैंने बुलाया। “सुनीता, इधर आ। बारिश में भीग जाएगी।”

वो आई। छप्पर के अंदर खड़ी हो गई। पानी टपक रहा था। मैंने तौलिया दिया। “पोंछ ले।”

वो पोंछने लगी। ब्लाउज और भी चिपक गया। मैंने पास जाकर कहा, “सुनीता... अब और इंतजार नहीं कर सकता। तू मुझे पागल कर रही है।”

वो काँप गई। “मालिक...”

मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। “एक बार चूमने दे। सिर्फ एक बार। फिर जो चाहे कहना।”

वो इनकार करने वाली थी लेकिन मैंने झुककर उसके होंठ पकड़ लिए। पहली बार। नरम होंठ। थोड़ी सी गंध—मिट्टी और पसीने की। मैंने जीभ अंदर डाली। वो झटके खा रही थी लेकिन मैंने कमर पकड़ ली। उसकी साँस तेज हो गई।

“मालिक... नहीं... छोड़ो...”

मैंने छोड़ दिया। लेकिन अब वो भाग नहीं पाई। मैंने फिर से चूमा। इस बार गहरा। थूक मिलाया। उसकी जीभ भी धीरे-धीरे जवाब देने लगी। उसकी आवाज निकली।

मैंने उसका ब्लाउज ऊपर उठाया। बड़े-बड़े दूध बाहर आ गए। काले निप्पल खड़े। मैंने एक निप्पल मुंह में ले लिया। चूसा। काटा। “आआआह्ह्ह...” पहली बार उसकी सिसकारी निकली।

“मालिक... दर्द... हो रहा है...”

मैंने दूसरा भी चूसा। दोनों दूध दबा-दबाकर। “सुनीता... तेरे दूध कितने मस्त हैं। कितने गोल।”

वो दीवार से सट गई। मैंने उसकी साड़ी खोल दी। नीचे फ्रॉक जैसी चीज थी। उसे भी ऊपर किया। बालों वाली चूत। काले घने बाल। बीच में गुलाबी दरार। मैंने उंगली रखी। गीली थी। “साली... पहले से गीली है तू।”

“मालिक... मत करो... मैं... मैं कुँवारी हूँ... दर्द होगा...”

मैंने उंगली अंदर डाली। टाइट। बहुत टाइट। खून की महक आने वाली थी। मैंने घुटनों के बल बैठकर उसकी चूत सूँघी। तीखी गंध। मिट्टी मिली हुई। मैंने जीभ निकाली और चाटा। “आह्ह्ह... मालिक...”

मैंने उसके दोनों चूतड़ पकड़कर चूत चाटने लगा। जीभ अंदर-बाहर। क्लिट चाटा। वो काँप रही थी। जाँघें बंद करने की कोशिश कर रही थी लेकिन मैंने खोल रखीं। “आआआह्ह्ह... रुको... रुको मालिक... बहुत... अजीब लग रहा है...”

मैंने दस-पंद्रह मिनट सिर्फ चाटा। उसका पानी मेरे मुंह में आने लगा। स्वाद नमकीन-मीठा। मैंने उंगलियाँ अंदर डालीं—दो उंगलियाँ। फैलाया। “सुनीता... तेरी चूत कितनी टाइट है। कुँवारी वाली।”

वो रो रही थी और मजा भी ले रही थी। “मालिक... मत... मत फाड़ो...”

मैंने अपना लंड निकाला। नौ इंच का मोटा लंड। नसें फूली हुई। प्रीकम टपक रहा था। उसके मुंह के पास ले गया। “चूस। पहली बार चूस।”

वो झिझकी। फिर मुंह खोला। लंड अंदर गया। दाँत लग गए। मैंने सिर पकड़कर धीरे-धीरे अंदर किया। “आह्ह्ह... साली... दाँत मत लगा... जीभ से चूस।”

वो चूसने लगी। अनुभवहीन लेकिन कोशिश कर रही थी। गले तक गया तो खांसी आई। मैंने बाहर निकाला। फिर अंदर। थूक बह रहा था। “आआआह्ह्ह... अच्छा चूस रही है तू।”

मैंने उसे पेट के बल लिटाया। छप्पर के फर्श पर। उसके चूतड़ ऊपर। चूत की गुलाबी दरार साफ दिख रही थी। मैंने लंड चूत पर रखा। “सुनीता... अब अंदर जाएगा। दर्द होगा। सह ले।”

“मालिक... प्लीज... धीरे... मैं... मैं डर रही हूँ...”

मैंने धीरे-धीरे धक्का मारा। सिर्फ टिप अंदर गई। टाइट। बहुत टाइट। फिर और। “आआआह्ह्ह... दर्द... दर्द हो रहा है मालिक...”

मैंने और धक्का मारा। झिल्ली फटी। खून निकला। मैंने पूरा लंड अंदर कर दिया। उसकी चीख निकल गई। “आआआह्ह्ह्ह... फट गई... मेरी चूत फट गई...”

मैंने रुका। अंदर रखा। उसकी पीठ सहलाई। “अब दर्द कम हो जाएगा। साँस ले।”

दो-तीन मिनट बाद मैंने धीरे-धीरे हिलाना शुरू किया। खून और पानी मिला हुआ। छप-छप की आवाज। “आह्ह्ह... मालिक... धीरे...”

मैंने रफ्तार बढ़ाई। उसके चूतड़ थप-थप कर रहे थे। मैंने कमर पकड़कर जोर के धक्के मारे। “सुनीता... तेरी चूत कितनी गरम है... कितनी टाइट...”

“आआआह्ह्ह... जोर... से... मत... आआआह्ह्ह...”

मैंने बीस-पच्चीस धक्के मारे। फिर निकाला। उसे उलटा किया। उसके पैर फैलाए। फिर से अंदर। इस बार आमने-सामने। उसके दूध मेरे सीने से रगड़ रहे थे। मैंने निप्पल चूसे। धक्के तेज किए। “आह्ह्ह... चोद... मुझे चोद मालिक...”

पहली बार उसने खुद कहा। मैंने पागलों की तरह पेलना शुरू किया। छप-छप-छप। उसकी सिसकारियाँ। “आआआह्ह्ह... हां... और तेज... फाड़ दो...”

मैंने महसूस किया—मेरा माल आने वाला है। “सुनीता... अंदर छोड़ूँ?”

“हाँ... हाँ... छोड़ दो... आआआह्ह्ह...”

मैंने जोर का धक्का मारकर अंदर ही माल छोड़ दिया। गरम-गरम लावा उसकी कुँवारी चूत में। इतना कि बाहर निकलने लगा। “आह्ह्ह... साली... ले ले मेरा माल...”

वो काँप रही थी। आँखें बंद। मैंने लंड अंदर रखा। माल रिस रहा था। मैंने उंगली से निकाला और उसके मुंह के पास ले गया। “चाट।”

वो झिझकी लेकिन चाट लिया। “कड़वा है...”

मैंने फिर से खड़ा किया। दस मिनट आराम करके दूसरा राउंड शुरू किया। इस बार उसे गोद में लिया। खड़े-खड़े। उसके पैर मेरी कमर में। लंड अंदर। मैंने ऊपर-नीचे किया। उसके दूध मेरे मुंह में। “आआआह्ह्ह... मालिक... इतना गहरा...”

मैंने दीवार से सटाकर पेलना शुरू किया। थप-थप। उसकी गांड मेरे हाथों में। मैंने एक उंगली गांड की दरार में डाली। “आह्ह्ह... वहाँ मत...”

“अगली बार वहाँ भी लूंगा। आज सिर्फ चूत।”

दूसरा माल भी अंदर ही छोड़ा। इस बार और ज्यादा। वो थककर मेरे कंधे पर गिर गई।

तीसरा राउंड मैंने उसे कुत्ते की तरह किया। मुंह नीचे, गांड ऊपर। बाल पकड़कर। जोर-जोर से। “आआआह्ह्ह... मारो... मारो मालिक... मेरी चूत फाड़ दो...”

मैंने पचास धक्के मारे। हर धक्के पर छप-छप। उसका पानी टपक रहा था। खून मिला हुआ। मैंने आखिरी माल उसके चूतड़ पर छोड़ा। सफेद-सफेद। फिर उंगली से उठाकर उसके मुंह में डाल दिया।

बारिश रुक चुकी थी। छप्पर के बाहर पानी की आवाज। मैंने उसे साफ किया। कपड़े पहनाए। “सुनीता... अब तू मेरी हो गई। रोज आना। विमल का बंडल रोज मिलेगा। और पैसे भी।”

वो चुप थी। आँखों में पानी। “मालिक... मेरी इज्जत चली गई... अगर किसी ने...”

“कोई नहीं जानेगा। तू चुप रह। मैं भी। और जब मन करे तो बता। मैं तेरी गांड भी मारूंगा। तुझे गर्भवती भी कर दूंगा अगर चाहे।”

वो रोते हुए चली गई। हाथ में विमल का नया बंडल था।

मैं छप्पर में बैठा रहा। लंड अभी भी गीला। सुनीता की चूत की महक हाथों पर। आज से ये खेत सिर्फ अनाज नहीं उगाएगा। सुनीता की चूत भी।

अगले दिन वो आई। नजरें नहीं मिलाईं। लेकिन काम करते-करते मेरे पास आ गई। चुपके से बोली, “मालिक... आज भी... विमल दोगे?”

मैंने मुस्कुराकर बंडल उसकी साड़ी में ठूँस दिया। और उसके चूतड़ पर थपकी दी। “हाँ। और आज शाम को छप्पर में आना। आज गांड भी आजमाएंगे।”

वो शरमाई। लेकिन इनकार नहीं किया।

उस शाम फिर वही छप्पर। इस बार वो खुद आई। कपड़े खुद खोले। दूध बाहर। चूत अभी भी सूजी हुई। मैंने पहले चूत चोदी। फिर गांड। धीरे-धीरे। खून नहीं निकला लेकिन बहुत टाइट थी। उसकी चीखें। मेरा माल दोनों जगह।

रात को घर जाकर मैंने सोचा—विमल के बंडल की कीमत क्या थी? कुछ नहीं। और सुनीता की कुँवारी चूत? अनमोल।

अब हर हफ्ते दो-तीन बार। कभी खेत में, कभी छप्पर में। कभी रात को उसके झुग्गी के पास। वो धीरे-धीरे बदल गई। पहले रोती थी। अब खुद मांगती है। “मालिक... आज जोर से चोदो। मेरी चूत में माल भर दो।”

मैंने उसे अपनी रंडी बना लिया। गरीब मजदूर लड़की। विमल की लालच में। और अब वो खुद लालच में फंसी हुई है—मेरे लंड की।