बारिश में बंद कमरा, खुला ब्लाउज और अधूरा साइन

जरूरी फाइल थी, साइन चाहिए था। दफ्तर खाली, पंखे की आवाज और बाहर बारिश। अजय ने दरवाजा बंद करवाया, फाइल एक तरफ सरकाई और कहा—“मत कहो सर अभी।” नाम निकलते ही हाथ कमर पर आ गया, फिर स्तन पर, फिर और नीचे। दिव्या की पैंटी चिपक चुकी थी। वो शाम सिर्फ साइन की नहीं थी।

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Divya

8/30/2026

मेरा नाम दिव्या है। उम्र अट्ठाईस साल। मैं सरकारी दफ्तर में काम करती हूँ—फाइलें, नोटशीट, साइन, चक्कर और इंतजार। कमरे में पंखे की आवाज, फाइलों की गंध, और बाहर गलियारे में जूतों की आहट। लोग मुझे शांत समझते हैं। मैं काम निपटाती हूँ, कम बोलती हूँ, साड़ी ठीक से पहनती हूँ, और नजरें ज्यादा देर किसी पर नहीं टिकाती।

पर अजय को यह सब दिखता था।

अजय उसी दफ्तर में ऑफिसर थे। मुझसे थोड़े बड़े, साफ यूनिफॉर्म, सीधी कमर, और आँखें जो फाइल से ज्यादा इंसान पर रुक जातीं। पहली बार उन्होंने मुझे तब देखा जब मैं एक मोटी फाइल लेकर उनके कमरे के बाहर खड़ी थी। हाथ में फाइल भारी थी, माथे पर हल्की पसीने की चमक थी, साड़ी का पल्लू कंधे पर सरक आया था। उन्होंने दरवाजा खोला और एक पल के लिए बस देखते रह गए।

“आ जाइए,” उन्होंने कहा, पर आवाज में काम से ज्यादा कुछ और था।

मैं अंदर गई, फाइल टेबल पर रखी, और पेज खोलकर दिखाने लगी। वे सुन रहे थे, पर उनकी नजर बार-बार मेरे चेहरे से नीचे जाती—गले की चेन पर, साड़ी की बॉर्डर पर, फिर मेरे हाथों पर जो फाइल थामे हुए थे। मुझे अहसास हो गया था। दिल की धड़कन थोड़ी तेज हुई, लेकिन मैंने बात फाइल पर ही रखी।

उस दिन के बाद अजय मेरे पीछे-पीछे घूमने लगे।

सुबह दफ्तर आते ही वे पूछते, “दिव्या जी, आपकी फाइल कहाँ तक पहुँची?”

दोपहर को गलियारे में मिल जाते, “चाय हो जाए?”

शाम को जब सब निकलने लगते, वे जानबूझकर मेरे सेक्शन के पास खड़े हो जाते।

वे फिदा थे। यह छिपता नहीं था।

वे मेरे आने-जाने का समय याद रख लेते। मैं कैंटीन जाती तो वे भी आ जाते। लिफ्ट में अकेली होती तो वे पीछे से आ जाते। फाइल के बहाने मेरे टेबल के पास खड़े रहते, इतने पास कि उनकी आस्तीन मेरी साड़ी से छू जाए। कभी-कभी जानबूझकर फाइल मेरे हाथ से लेते, उंगलियाँ मेरी उंगलियों पर रुक जातीं।

“हाथ ठंडे हैं आपके,” एक दिन उन्होंने धीरे से कहा।

मैंने फाइल खींची, “सर, साइन कर दीजिए।”

वे मुस्कुराए, पर फाइल नहीं खोली तुरंत। नजरें मेरे चेहरे पर टिकाईं। “आप हमेशा इतनी जल्दी में रहती हैं, दिव्या।”

मैं चुप रही। अंदर हलचल हो रही थी। उनकी आवाज भारी थी, और उस भारीपन में एक भूख थी जो मैं पहचान रही थी।

हफ्तों तक यही चला। वे आगे-पीछे दौड़ते। कभी मेरे केस को प्राथमिकता देते, कभी अनावश्यक क्वेरी लगाकर मुझे अपने कमरे बुलवाते, कभी देर शाम तक रोक लेते कि “एक पेज और चेक करना है।” मैं समझ गई थी कि फाइल बहाना है। असली चीज मैं हूँ।

एक दिन बारिश हो रही थी। दफ्तर खाली होने लगा। मेरे पास एक जरूरी फाइल थी, जिस पर उनका साइन चाहिए था। बिना साइन के फाइल आगे नहीं बढ़ सकती थी। मैं उनके कमरे गई। गलियारा सुनसान था। पंखे की आवाज और बारिश की टप-टप।

कमरे में वे अकेले थे। कुर्सी पर पीछे झुके हुए, कमीज के ऊपर के दो बटन खुले। उन्होंने मुझे देखा और दरवाजे की तरफ इशारा किया।

“बंद कर दीजिए।”

मैंने दरवाजा बंद किया। दिल जोर से धड़क रहा था।

फाइल टेबल पर रखी। “सर, बस साइन चाहिए।”

वे फाइल खोली, पेज पलटा, पर पढ़ नहीं रहे थे। नजरें मुझ पर थीं। “आज देर हो गई आपको।”

“फाइल जरूरी है।”

वे कुर्सी से उठे और मेरे पास आए। इतने पास कि मैं पीछे सरक गई, कमर टेबल से लग गई। उनकी खुशबू—हल्की आफ्टरशेव और गर्म त्वचा। उन्होंने फाइल को एक तरफ सरकाया।

“दिव्या… आप जानती हैं ना, मैं कितने दिनों से आपको देख रहा हूँ।”

मेरी साँस अटकी। “सर… ये बातें मत—”

“मत कहो सर अभी।” उन्होंने धीरे से कहा। उंगली मेरे गाल के पास आई, छूआ नहीं, बस हवा में रुकी। “आप जब फाइल लेकर आती हो, आपकी साड़ी का पल्लू सरकता है। आप जब झुकती हो, आपकी गर्दन की नस उभरती है। आप जब नाराज होती हो, होंठ भींच लेती हो। मैं सब देखता हूँ।”

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। निपल्स साड़ी-ब्लाउज के अंदर सख्त हो गए। मुझे शर्म भी आई, गुस्सा भी, और उसके नीचे एक गर्मी भी जो मैं छुपा नहीं पा रही थी।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। फाइल की तरफ नहीं, बस हाथ। अंगूठे से मेरी हथेली सहलाई। “आपको मजा नहीं आ रहा क्या, जब मैं आपके करीब आता हूँ?”

मैंने मुँह खोला, इनकार करना था, पर आवाज काँपी, “अजय… दफ्तर में—”

नाम निकल गया। उन्होंने मुस्कुराया, जैसे जीत मिल गई हो।

फिर उन्होंने मुझे टेबल की तरफ और खींचा। एक हाथ कमर पर रखा। गर्म हथेली, साड़ी के ऊपर से भी गर्मी उतर रही थी। दूसरा हाथ गाल पर आया, फिर होंठों के कोने पर। मैंने आँखें बंद कर लीं।

पहला चुंबन धीमा था। सिर्फ होंठों का स्पर्श। फिर दबाव बढ़ा। उनकी जीभ ने होंठ खोले। मेरी साँस उनकी साँस में मिल गई। “उम्म…” मेरे गले से आवाज निकली, जिसे मैं रोक नहीं पाई।

हाथ कमर से ऊपर गया, पसलियों पर, फिर ब्लाउज के किनारे पर रुका। उन्होंने पूछा नहीं। उंगली अंदर सरकाई। गर्म त्वचा। ब्रा का कप। उन्होंने स्तन को हथेली में भर लिया।

“आह…” मेरे मुँह से निकला।

“इतनी नरम…” उन्होंने फुसफुसाया और निपल को उंगलियों के बीच दबाया। बिजली सी दौड़ गई। मेरी कमर टेबल पर और दब गई। जाँघें अपने आप सिकुड़ीं।

वे दोनों स्तनों को ब्लाउज और ब्रा के ऊपर से मसलने लगे, फिर ब्रा नीचे सरकाई। मुँह गर्दन पर चला गया—चुंबन, हल्की दाँत की रगड़, फिर निपल मुँह में। जीभ गोल घूमी, फिर जोर से चूसा।

“आह्ह… अजय… धीरे… यहाँ कोई…”

“कोई नहीं है।” उन्होंने दूसरा स्तन भी मुँह में लिया। मेरे हाथ उनके बालों में चले गए। मैं उन्हें धकेलना चाहती थी, पर पकड़ रही थी। शरीर धोखा दे रहा था। चूत गीली होने लगी थी, पैंटी चिपक रही थी।

उन्होंने साड़ी का पल्लू हटाया। हाथ जाँघ पर गया, पेटीकोट के ऊपर से ऊपर सरका। पैंटी के किनारे पर उंगली रुकी, फिर अंदर। गीलापन उंगली पर लग गया।

“दिव्या… तुम भीगी हो चुकी हो।”

शर्म से चेहरा जल गया, पर कमर उनकी उंगली की तरफ बढ़ गई। उन्होंने एक उंगली अंदर डाली। धीरे। फिर दो। अंगूठा क्लिट पर घूमने लगा।

“आह… आह… वहाँ… मत रोको…” मेरे मुँह से आवाजें निकल रही थीं, जिन्हें मैं दबा रही थी और जो दब नहीं रही थीं।

वे घुटनों के बल बैठ गए। मेरी एक टाँग उनकी कंधे पर। पैंटी साइड में। जीभ चूत पर लगी—लंबी चाट, क्लिट पर गोल घुमाव, फिर चूसना। मेरे दोनों हाथ टेबल के किनारे कस गए।

“आह्ह्ह… अजय… जीभ… उम्मम… मैं…”

वे नहीं रुके। उंगलियाँ अंदर घूमती रहीं, जीभ क्लिट पर तेज हुई। मेरा शरीर अकड़ने लगा। पैर काँपे। “आह्ह्ह… आ रही हूँ… अजय… आह्ह्ह…”

पहला चरम आया। रस बह निकला। उन्होंने चाटते हुए थामा। मैं टेबल पर लगभग बैठ गई, साँसें टूट रही थीं, साड़ी बिखरी हुई, ब्लाउज खुला, स्तन बाहर, गर्दन पर उनकी लार की चमक।

वे उठे। बेल्ट खोली। लंड बाहर आया—लंबा, तना हुआ, सिर गीला। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर उस पर रखा। “देखो… कितने दिनों से ऐसा ही रहता हूँ तुम्हारे लिए।”

मेरी उंगलियाँ अपने आप चलने लगीं। ऊपर-नीचे। उन्होंने आह भरी। “मुँह में लो, दिव्या।”

मैं झुकी। जीभ से सिर चाटा, फिर मुँह में लिया। गहरी नहीं पहले, फिर और अंदर। उनकी उंगलियाँ मेरे बालों में थीं। “आह… चुसो… और… उम्म…”

थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे उठाया, कुर्सी घुमाई, मुझे बैठाया, टाँगें फैलाईं, और लंड चूत के मुँह पर रखा। आँखों में आँखें।

“बोलो अगर रोकना है।”

मैंने सिर हिलाया। रोकना नहीं था। “अंदर… धीरे…”

वे धीरे घुसे। पूरा। मैंने होंठ काट लिए, फिर आवाज निकल ही गई, “आह्ह्ह… बड़ा… अह…”

फिर धक्के। पहले लंबे और धीमे, हर बार पूरा अंदर तक। मेरे स्तन हिल रहे थे। उन्होंने एक स्तन मुँह में लिया, कमर पकड़ी, रफ्तार बढ़ाई। कमरे में मांस की टक्कर, मेरी दबी कराहें, उनकी भारी साँसें।

“आह… जोर से… वहाँ… अजय… चोदो… आह्ह…”

दूसरा चरम पास था। उन्होंने क्लिट पर अंगूठा रखा, धक्के तेज किए। मैं कुर्सी पर अकड़ गई। “आह्ह्ह्ह… आ रही… मत निकालो…”

वे अंदर ही झड़ गए। गर्म भर गया। मैं उनकी गर्दन से चिपक गई, काँपती हुई।

फाइल टेबल के किनारे पड़ी थी, अभी भी बिना पूरे साइन के। उन्होंने मेरे माथे पर होंठ रखे और धीरे कहा, “साइन बाद में होगा। अभी तुम जा नहीं रही।”

मैं जानती थी। बारिश अभी हो रही थी। दफ्तर खाली था। और मेरा शरीर अभी भी उनकी उंगलियों के नीचे सिहर रहा था।

यह सिर्फ शुरुआत थी।

वे मुझे अपने सरकारी क्वार्टर ले गए। रास्ते में कार में हाथ मेरी जाँघ पर रहा। कभी साड़ी के पल्लू के नीचे से चूत सहलाते, कभी मेरे कान में कहते, “आज रात मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं।” मेरी साँसें फिर तेज हो जातीं। “अजय… गाड़ी में मत…” पर मेरी जाँघें खुल जातीं।

घर के अंदर दरवाजा बंद होते ही उन्होंने मुझे दीवार से सटाया। साड़ी पूरी उतरी। ब्लाउज, ब्रा, पेटीकोट, पैंटी—सब फर्श पर। मैं नंगी खड़ी थी, वे अभी कमीज में। उन्होंने मुझे देखा जैसे कोई फाइल नहीं, कोई दफ्तर नहीं, सिर्फ शरीर।

“इतने दिनों से बस यही सोचा है,” उन्होंने कहा और दोनों स्तनों को मुँह में भर लिया। इस बार जल्दी नहीं थी। लंबे समय तक चूसा, काटा, जीभ फेरी। मेरे निपल्स दुखने लगे, फिर भी मैं सिर पीछे किए आहें भरती रही, “आह… और… मत छोड़ो…”

बिस्तर पर उन्होंने मुझे लिटाया। टाँगें कंधों तक। पहले सिर्फ मुँह। जीभ अंदर तक, उंगलियाँ के साथ। मैं चादर कसती, कमर उठाती, उनकी बालों में उंगलियाँ फँसाती। “आह्ह अजय… जीभ वहाँ… क्लिट… जोर से चूसो… उम्मम… पागल कर दिया…”

तीसरा चरम मुँह पर आया। मेरे रस उनके होंठों और ठोडी पर थे। उन्होंने चाटा और ऊपर चढ़ आए।

इस बार आमने-सामने। धीमे लंबे धक्के। आँखें मिली हुई। हर धक्के पर मैं उनके पीठ पर नाखून चलाती। “अजय… मुझे बाँध लो… दफ्तर में भी… घर में भी… आह…”

“बाँध लिया है,” उन्होंने कहा और रफ्तार बढ़ाई। बिस्तर की आवाज, शरीर की आवाज, मेरी आवाज—सब एक हो गई। “आह्ह… मारो… गहरा… मैं फिर से… आह्ह्ह…”

वे अंदर झड़े। निकाले नहीं। अंदर ही पड़े रहे, चूमते रहे, स्तन सहलाते रहे, जब तक लंड फिर सख्त न हो गया।

रात में चौथी बार शावर में हुई। पानी गिर रहा था। वे पीछे से आए, मेरी टाँग उठाई, अंदर घुसे। एक हाथ स्तन पर, एक क्लिट पर। मेरे माथे दीवार से लगे। आवाजें टाइल पर गूँजीं। “आह… इस कोण से… बहुत गहरा… अजय… चोदो… जोर से… मैं गिरी जा रही…”

वे बाल पकड़कर गर्दन पर मुँह लगाए रहे। मैं पानी के नीचे काँपते हुए आई, वे भी अंदर।

सुबह होने तक शरीर दर्द में था और फिर भी माँग रहा था। वे चाय बनाने गए, लौटे तो मैं चादर में लिपटी थी। उन्होंने चादर हटाई, जाँघें खोलीं, और फिर से जीभ लगा दी। मैंने उनकी कलाई पकड़ी, “अभी दुख रहा है…”

“तो हल्के-हल्के,” उन्होंने कहा और हल्के ही किया—इतने हल्के कि मैं और गीली हो गई। “आह… ऐसे ही… उम्म… मत रोको…”

दोपहर तक हम फिर बिस्तर पर थे। मैं उनके ऊपर बैठी। खुद कमर घुमा रही थी। स्तन उनके चेहरे के सामने हिल रहे थे। वे निपल मरोड़ते, कमर पकड़ते, नीचे से धक्का देते। “दिव्या… तुम खुद चोद रही हो… देखो कैसे बैठती हो… आह…”

“चुप… अह्ह… और पकड़ो…” मैंने कहा और तेजी बढ़ाई जब तक चौथा या पाँचवाँ चरम—मैं गिनती भूल चुकी थी—न आ जाए। वे भी मुझमें झड़ गए।

शाम को उन्होंने वह फाइल निकाली जो दफ्तर से साथ आ गई थी। मेरे नंगे शरीर के पास फाइल खोली, पेन लिया, और साइन कर दिया। फिर पेन एक तरफ रखा और मुझे फिर खींच लिया।

“फाइल हो गई,” उन्होंने मेरे कान में कहा। “अब तुम्हारी बारी हर दिन की है।”

मैं उनकी छाती पर लेटी रही। शरीर में उनकी गर्मी, अंदर उनका रस, गले पर उनके निशान। आँखें बंद थीं, पर मुस्कान थी।

मैं सरकारी दफ्तर में काम करती हूँ। लोग मुझे शांत समझते हैं। फाइलें लेकर चलती हूँ, साइन करवाती हूँ, गलियारे पार करती हूँ।

पर अब जब अजय का कमरा आता है, मेरी साँस बदल जाती है। और जब दरवाजा बंद होता है, मैं वही दिव्या नहीं रहती जो सुबह दफ्तर में घुसी थी।

यह मेरी असल कहानी है।

अजय फिदा थे। आगे-पीछे दौड़ते थे। मौका फाइल का था।

मजा मुझे भी आया।

और अब हर साइन के बाद कहानी फिर शुरू होती है।