नौकरानी सुनीता की टाइट गांड और गरम चूत

पत्नी ठंडी, घर में 25 साल की गोरी-मटोल नौकरानी। झाड़ू लगाते हुए पल्लू खिसका, गांड उभर आई… फिर मेमसाहब मायके चली गईं। उस रात दरवाज़ा बंद होते ही साहब ने दीवार से सटाकर क्या-क्या किया, पढ़ते ही लंड तन जाएगा।

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Rahul

7/21/2026

मेरा नाम राहुल है। उम्र तीस साल। नोएडा की एक सोसाइटी में फ्लैट है। शादी को चार साल हो चुके हैं। पत्नी प्रिया अच्छी औरत है, लेकिन सेक्स में बहुत ठंडी। हफ्ते में एक बार भी मुश्किल से मन करती है, वो भी जल्दी-जल्दी निपटाकर सो जाती है। घर में एक नौकरानी रखी हुई है सुनीता। उम्र पच्चीस के करीब। गाँव से आई हुई, गोरी चमकदार त्वचा, गोल मटोल चेहरा और बदन ऐसा कि देखकर लंड अपने आप खड़ा हो जाए। छत्तीस साइज के भारी बोबे, पतली कमर और ऐसी गोल गांड कि साड़ी पहनने पर भी साफ उभर आती है।

पत्नी के मायके जाने से लगभग दस दिन पहले की बात है। सुबह का समय था। सुनीता मेरे कमरे में झाड़ू लगा रही थी। मैं बेड पर लेटा मोबाइल चला रहा था। वो कमरे के कोने में झुकी हुई थी। साड़ी का पल्लू खिसक गया था और उसकी गोल टाइट गांड साफ नजर आ रही थी। सलवार बदन से चिपक गई थी। मैंने मोबाइल नीचे रख दिया और घूरने लगा। सुनीता ने पीछे मुड़कर देखा।

“साहब, कुछ चाहिए क्या?”

मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं सुनीता… बस तुम्हारी गांड आज बहुत गोल और टाइट लग रही है।”

वो शरमा गई। “साहब… ऐसी बातें मत किया करो। मेमसाहब आ जाएंगी तो क्या होगा?”

“मेमसाहब अभी बाथरूम में हैं। और सच तो सच है न। तुम्हारी ये गांड देखकर मेरा लंड तन जाता है।”

सुनीता ने झाड़ू कसकर पकड़ी। “साहब आप बहुत बोल्ड हो गए हो। मैं नौकरानी हूँ… ऐसी बातें ठीक नहीं।”

मैंने आवाज धीमी करके कहा, “नौकरानी हो तो क्या हुआ? तुम्हारे बोबे और गांड तो कई मेमसाहब से बेहतर हैं।”

वो चुपचाप फिर से झुक गई, लेकिन इस बार जानबूझकर थोड़ा और झुकी। मेरा लंड पैंट में पूरी तरह खड़ा हो गया। जैसे ही वो कमरे से निकली, मैं बाथरूम भागा और उसकी उस झुकी हुई गांड को याद करके जोर-जोर से मुठ मार ली। गाढ़ा माल वॉशबेसिन में छोड़ दिया।

पाँच दिन बाद पत्नी अपनी सहेली के घर गई हुई थी। घर में सिर्फ मैं और सुनीता थे। वो रसोई में बर्तन धो रही थी। कमीज पसीने से भीगकर उसके बोबों से चिपक गई थी। निप्पल की काली नोक साफ उभर रही थी। मैं पानी का गिलास लेने गया और उसके बिल्कुल बगल में खड़ा हो गया।

“सुनीता…”

“जी साहब?”

“तुम्हारे निप्पल आज बहुत कड़े दिख रहे हैं। पसीने में भीगकर और भी सेक्सी लग रहे हो।”

वो बर्तन धोना बंद करके मेरी तरफ देखी। “साहब… आप रोज ऐसी गंदी बातें करते हो। मैं क्या जवाब दूँ?”

“जवाब में कुछ नहीं देना। बस इतना बताओ कि रात को अकेले में अपने बोबे दबाती हो क्या?”

सुनीता के गाल लाल हो गए। “साहब… पाप लगेगा आपको।”

मैंने उसका गीला हाथ पकड़ लिया और अपनी पैंट पर रख दिया। लंड पूरी तरह तना हुआ था। “ये देख। तुम्हारी वजह से दिन में तीन-चार बार ऐसा हो जाता है। रात को हिला-हिलाकर थक जाता हूँ।”

वो हाथ हटाने की कोशिश करती रही लेकिन जोर नहीं लगाया। उँगलियों से हल्का सा दबा भी दिया। फिर धीरे से बोली, “साहब… छोड़ो… अगर कोई देख ले तो…”

“कोई नहीं है आज। सिर्फ तू और मैं।”

वो अपना हाथ छुड़ाकर रसोई से बाहर भाग गई। लेकिन जाते-जाते एक बार मुड़कर देखी। उस रात मैंने दो बार मुठ मारी। एक बार उसकी पसीने से भीगी कमीज याद करके और दूसरी बार उसके हाथ के स्पर्श को याद करके।

पत्नी मायके जाने वाली सुबह सामान पैक हो रहा था। सुनीता मेरे कमरे में कपड़े प्रेस कर रही थी। पत्नी बाथरूम में थी। मैंने दरवाजे के पास जाकर आवाज धीमी की।

“सुनीता।”

“जी साहब।”

“मेमसाहब चार दिन के लिए जा रही हैं। तुम घर सँभालना… और मुझे भी।”

वो प्रेस हवा में रोककर मेरी तरफ देखी। “साहब… आप क्या कहना चाह रहे हो?”

“सीधा कह रहा हूँ। चार दिन तुम मेरे पास सोना। मैं तुम्हें चोदूंगा।”

सुनीता की आँखें फटी की फटी रह गईं। “साहब… ये… ये बहुत गलत बात है। मैं नौकरानी हूँ… आप साहब हो…”

“नौकरानी हो तो क्या हुआ? तुम्हारी चूत तो पत्नी से ज्यादा गरम लगती है मुझे।”

वो प्रेस नीचे रखकर मेरे करीब आई। आवाज काँप रही थी, “साहब… अगर मेमसाहब को पता चल गया तो?”

“पता नहीं चलेगा। तू चुप रहना, मैं चुप रहूँगा। बस आज रात से तू मेरे बेड पर आएगी।”

सुनीता ने नीचे देखा और धीरे से बोली, “साहब… मैं डर रही हूँ… लेकिन…”

मैंने उसका हाथ पकड़कर अपनी पैंट पर फिर से रखा। “लेकिन क्या? बोल।”

“लेकिन मुझे भी… कभी-कभी आपके बारे में गंदा लगता है।”

इतना कहते ही वो प्रेस लेकर कमरे से बाहर चली गई। मेरा लंड इतना तन गया था कि दर्द होने लगा।

शाम के सात बजे पत्नी का फोन आया कि वो पहुँच गई है। मैंने दरवाजे का मुख्य लॉक लगा दिया। सुनीता रसोई से निकली तो मैंने उसका हाथ पकड़कर सीधे अपने बेडरूम में ले आया। दरवाजा बंद करते ही मैंने उसे दीवार से लगा दिया।

“अब भाग नहीं सकती।”

मैंने उसके होंठों पर जोर से अपना मुँह रख दिया। जीभ अंदर डालकर उसके दाँतों तक पहुँचा दी। सुनीता पहले तो सख्त रही, फिर धीरे-धीरे उसकी जीभ भी निकल आई। दोनों के मुँह में थूक की आवाज आने लगी। मैंने उसकी साड़ी का पल्लू खींचकर फर्श पर फेंक दिया। ब्लॉउज के हुक खोले। अंदर ब्रा नहीं थी। दो भारी, गोरे बोबे झूलते हुए बाहर आ गए। निप्पल काले और पहले से कड़े। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। दूसरी तरफ हाथ से मसलने लगा।

“आह्ह्ह साहब… हल्का… दाँत मत लगाओ…”

मैंने दाँतों से हल्का काटा और खींचा। “तेरे निप्पल का स्वाद ही अलग है सुनीता। पत्नी के निप्पल तो फीके लगते हैं इसके आगे।”

फिर मैंने साड़ी और पेटीकोट एक साथ नीचे सरका दिए। सुनीता पूरी नंगी हो गई। उसकी चूत पर घने काले बाल थे। पंखुड़ियाँ मोटी और पहले से चमक रही थीं। मैंने उसे बेड पर लिटाया। टाँगें फैलाईं और अपना चेहरा उसकी चूत के बीच ले गया। पहले नाक सटाकर जोर से सूँघा। तीखी, गहरी, औरत वाली खुशबू।

“क्या कमाल की खुशबू है तेरी चूत की… दिन भर इसी को सूँघता रहूँ।”

फिर जीभ निकालकर नीचे से ऊपर तक एक लंबा, धीमा चाटा मारा। क्लिट को मुँह में लेकर घुमाने लगा। दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। अंदर की दीवारें गरम और गीली थीं।

“उउउउ साहब… आह्ह्ह… जीभ और अंदर… हाँ… वहीं… धीरे… नहीं… जोर से चाटो…”

मैंने उँगलियाँ तेज करते हुए उसकी चूत का पानी चाट-चाट कर पीना शुरू कर दिया। उसका स्वाद हल्का खट्टा-मीठा था। सुनीता की कमर बार-बार उछल रही थी। थोड़ी देर बाद मैंने अपना लंड निकाला। नौ इंच का मोटा, नसों से भरा लंड। उसके मुँह के सामने ले जाकर टिप पर रखा।

“अब तू चूस। पहले इसे अच्छी तरह गीला कर।”

सुनीता ने दोनों हाथों से लंड पकड़ा और टिप पर जीभ फेरी। फिर धीरे-धीरे मुँह में लिया। आधा जाते-जाते उसका गला भर गया।

“और ले… गले तक ले… मेरी रंडी।”

वो गड़बड़ाते हुए चूसने लगी। थूक लंड पर बहकर उसके बोबों तक पहुँच रहा था। मैंने बाल पकड़कर हल्के धक्के देने शुरू कर दिए।

जब सुनीता की चूत पूरी तरह से पानी छोड़ने लगी और वो खुद लंड की तरफ कमर उठाने लगी, तब मैंने उसे सीधा लिटाया। टाँगें कंधों पर चढ़ाईं। लंड की टिप उसकी गीली पंखुड़ियों पर रखी और धीरे से दबाव डाला।

“आह्ह्ह्ह साहब… बहुत मोटा है… अंदर नहीं जाएगा… धीरे…”

मैंने एक और जोर लगाया। आधा लंड घुस गया।

“फाड़ दिया… मेरी चूत फट गई साहब… आह्ह्ह…”

मैंने पूरा लंड एक ही धक्के में अंदर तक पेल दिया। उसकी गरम, टाइट दीवारें मेरे लंड को जकड़कर रख गईं। मैंने धीरे-धीरे पेलना शुरू किया।

“आह्ह्ह… उउउउ… साहब… और गहरा… हाँ… वहीं…”

“कैसी लग रही है मेरी मोटा लंड तेरी नौकरानी चूत में?”

“बहुत… बहुत मस्त… आह्ह्ह… जोर से चोदो… मेरी चूत आपकी हो गई…”

मैंने रफ्तार बढ़ा दी। चाप-चाप-चाप की आवाज आने लगी। अंदर की गर्माहट ऐसी थी जैसे लंड पिघल जाएगा। मन ही मन सोच रहा था – साली की चूत पत्नी से कई गुना टाइट और गरम है… आज इसे रंडी बनाकर ही मानूँगा।

फिर मैंने उसे उठाया और दीवार से लगा दिया। एक टाँग मेरे कंधे पर रखी और खड़े-खड़े जोर-जोर से ठोकने लगा।

“आआह्ह्ह साहब… गिर जाऊँगी… पकड़ लो… और तेज… मेरी चूत फाड़ दो…”

“फाड़ ही रहा हूँ… तू सिर्फ सहती जा…”

मैंने उसे स्टडी टेबल पर पेट के बल लिटाया। पीछे से लंड लगाया और दोनों हाथों से उसकी गांड फैलाकर धपाक-धपाक पेलने लगा।

“आह्ह्ह… उउउ… साहब… गांड पर मारो… थप्पड़ मारो…”

मैंने जोर-जोर से थप्पड़ मारे। उसकी गांड लाल हो गई।

“तेरी ये गोल गांड भी आज ही लूँगा साली… पहले चूत साफ कर।”

“लो… ले लो सब कुछ… आह्ह्ह… मैं आपकी रंडी हूँ…”

मन में ख्याल आया – इसकी गांड कितनी नरम है… कल सुबह तक इसे चलने लायक भी नहीं छोड़ूँगा। मैंने गहराई तक पेलते हुए अपना पहला लोड उसकी चूत के अंदर छोड़ दिया। गरम गाढ़ा माल उसकी कोख में भर गया। निकालते समय सफेद माल उसकी पंखुड़ियों से रिस-रिसकर जांघों पर बहने लगा। सुनीता ने खुद उँगली से माल निकालकर मुँह में डाल लिया और चूसते हुए बोली, “साहब का माल… बहुत गाढ़ा और स्वादिष्ट है…”

मैं कुर्सी पर बैठ गया। सुनीता को उल्टा लंड पर बिठाया। उसके बोबे मेरे हाथों में थे। नीचे से उछाल-उछालकर चोदने लगा।

“आआआह्ह्ह साहब… इतना गहरा… मेरी चूत फट जाएगी… हां हां… और उछालो…”

“उछाल रहा हूँ… तू बस अपनी चूत ढीली मत कर…”

“नहीं करूँगी… आपकी चूत है ये… आह्ह्ह… झड़ रही हूँ साहब…”

उसकी चूत ने जोर से पानी छोड़ दिया। मैंने भी दूसरा लोड उसी के अंदर धकेल दिया। माल इतना था कि बाहर निकलकर कुर्सी की सीट पर सफेद धब्बे बना दिए।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे उनहत्तर की पोजीशन में ले लिया। नीचे से उसकी मलाईदार चूत चाट रहा था और ऊपर से वो मेरा लंड गले तक ले रही थी। दोनों के मुँह में एक-दूसरे के रस का स्वाद घुल रहा था। फिर मैंने उसे साइड में कर लिया। एक टाँग ऊपर उठाकर गहरे धक्के मारने लगा।

“आह्ह्ह साहब… अब और नहीं… सहन नहीं होता… मुँह में डाल दो…”

मैंने लंड निकालकर उसके मुँह में ठूस दिया और तीसरा लोड उसके गले में उड़ेल दिया। सुनीता ने आँखें बंद करके पूरा निगल लिया। कुछ माल उसके होठों पर लगा रह गया जिसे उसने जीभ से साफ किया।

हम दोनों पसीने से लथपथ बेड पर लेटे थे। सुनीता मेरे सीने पर सिर रखकर साँस ले रही थी। उसकी चूत से अभी भी मेरा माल धीरे-धीरे टपक रहा था। मैंने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “आज से तू सिर्फ झाड़ू-पोछा नहीं करेगी। जब भी मौका मिलेगा, मैं तुझे चोदूंगा।”

सुनीता ने थकी हुई आवाज में जवाब दिया, “जी साहब… जब चाहो बुला लेना… मैं आपकी नौकरानी हूँ… आपकी रंडी भी।”

मैंने उसके कान के पास मुँह लाकर कहा, “अगली बार तेरी गांड भी मारूंगा। और अगर पेट में कुछ हो गया तो भी चोदना नहीं छोडूँगा। तुझे अपनी निजी रखैल बनाकर रखूँगा।”

सुनीता ने मेरे लंड को हाथ में लेकर हल्के से हिलाया और मुस्कुराते हुए बोली, “तब तक ये लंड मेरे अंदर ही रहेगा साहब… निकालना मत…”

बाहर रात गहरी हो चुकी थी। कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज और सुनीता की चूत से टपकते माल की हल्की सी छप-छप बची थी।