मौसी की बेटी ने खुद कहा – गांड में डाल दो भैया
शर्मीली लगती थी लेकिन अंदर से कितनी हॉट… पहले 69, फिर तेल लगाकर गांड की चुदाई। दर्द में चीखी, फिर मज़े में सिसकने लगी।
SEX STORIES IN HINDI
Rahul
8/4/2026
मैं राहुल, बाईस साल का। कानपुर के पुराने मोहल्ले में मध्यमवर्गीय घर। माँ-बाबूजी, छोटी बहन और दादी के साथ। गर्मियों की छुट्टियों में मौसी का परिवार आया। मौसी की बेटी परी… मेरी मौसेरी बहन। उन्नीस साल। गोरी चमकदार त्वचा, लंबे घने बाल जो कमर तक लहराते, गोल-गोल दूध जैसे बूब्स जो ब्लाउज में फूले रहते, और गांड… गोल, मुलायम, साड़ी के नीचे से भी हिले तो लंड तन जाए। बचपन में साथ खेलते थे, अब वो जवान हो चुकी थी। आँखों में शर्मीली चमक लेकिन बदन में वो गर्मी जो छुप नहीं सकती थी।
पहली शाम खाना खाते वक्त मेरी नजर बार-बार उसके बूब्स पर जा रही थी। ब्लाउज थोड़ा टाइट, निप्पल की आकृति साफ। अंदर से सोचा – “साली… इतनी जवान। बचपन वाली परी अब ये बदन लेकर आई है। लंड हर वक्त खड़ा रहता है।” रात को सब सो गए तो मैं बाथरूम गया। झाग भरा पानी, पंखे की आवाज। मुठ मारी। परी की गांड और चूत की कल्पना। झड़ते वक्त माल दीवार पर लगा दिया। दिल में शर्म भी थी लेकिन लंड फिर तन गया।
अगले दिन दोपहर। घर में सिर्फ हम दो। माँ-बाबूजी बाजार, दादी सोई। परी टीवी देख रही थी। मैं पास बैठ गया। “परी… याद है बचपन में कैसे लूडो हारते थे?” वो मुस्कुराई, “हाँ भैया… तुम हमेशा हारते।” मैंने थोड़ा करीब सरकाया। कंधा छू गया। वो हिली नहीं। मैंने बोल्ड होकर कहा, “तेरा बाल आज बहुत सुंदर लग रहा है।” उसने सिर घुमाया, “अरे भैया… ऐसी बातें मत करो। मौसी आ जाएँ तो क्या सोचेंगी।” हाथ वापस खींच लिया। अंदर frustration. “ये तो बहुत दूर है… आसान नहीं होगा।”
दूसरे दिन सुबह चाय बनाते वक्त उसकी कमर में हल्का हाथ रखा। “चाय ले लो।” वो सख्त हो गई। “भैया… हाथ मत लगाओ। गलत लग रहा है।” मैंने मुस्कुराकर कहा, “क्या गलत? हम तो भाई-बहन जैसे हैं।” चेहरे पर घबराहट। वो जल्दी कमरे में चली गई। दिन भर उसके बारे में सोचा। रात को फिर मुठ। इस बार और जोर से। परी की गीली चूत की कल्पना करते हुए झड़ गया। माल फर्श पर गिरा, पानी से धोया।
तीसरे दिन मौका। सब मंदिर गए। सिर्फ हम। कमरे में घुसकर उसके बगल में बैठा। मोबाइल देख रही थी। धीरे से हाथ पकड़ा। “परी… तुझे कुछ कहना है।” वो घबराई, “क्या?” आँखों में देखा, “तेरा बदन… बहुत खूबसूरत है। मैं रोज सोचता हूँ।” हाथ छुड़ाया। “भैया… ये मत कहो। हम रिश्तेदार हैं। परिवार की इज्जत… अगर कोई सुन ले तो?” फिर कोशिश, “कोई नहीं सुन रहा। बस थोड़ी देर बैठ।” लेकिन वो उठकर बाहर चली गई। “मुझे पढ़ाई करनी है।” दिल में गुस्सा। “साली… कितनी मुश्किल है। इतनी आसानी से नहीं मिलेगी।”
अगले दो दिन मदद की। कॉलेज प्रोजेक्ट में सहायता, रात को देर तक बातें। धीरे-धीरे खुली। एक रात छत पर। हवा ठंडी, दूर गली से कुत्ते भौंक रहे थे, पंखा घूम रहा था। उसने बताया कॉलेज में लड़के परेशान करते हैं। मैंने सुना। “तुम चिंतित मत हो। मैं हूँ न।” सिर मेरे कंधे पर रख दिया। दिल जोर से धड़का। लंड तन गया। बाल सहलाया। सहम गई लेकिन हटी नहीं। कुछ देर बाद बोली, “भैया… ये गलत है। मैं डरती हूँ।” “डर किस बात का? हम सिर्फ बात कर रहे हैं।” तनाव बढ़ रहा था।
पाँचवें दिन फिर अकेला। दोपहर। दादी सोई, बाकी बाहर। कमरे का दरवाजा बंद किया। परी बिस्तर पर लेटी किताब पढ़ रही थी। पास बैठा। “परी… अब और नहीं सह सकता।” उठी। आँखें बड़ी। “क्या मतलब?” दोनों गाल पकड़े। “अब और इंतजार नहीं। तुझे चाहिए भी… मैं देख रहा हूँ।” मना किया, आँखों में आँसू। “नहीं… गलत है… मैं कुँवारी हूँ… परिवार की इज्जत…” लेकिन नहीं छोड़ा। होंठों पर होंठ रख दिए। पहली चुंबन। झटकी लेकिन कसकर पकड़ा। जीभ अंदर। थूक मिला। धीरे-धीरे जवाब देने लगी। साँस तेज। “उम्म… भैया… रुको…” लेकिन बाल पकड़ लिए।
टी-शर्ट ऊपर की। ब्रा खोली। गोल सफेद दूध जैसे बूब्स। निप्पल गुलाबी, तने। एक मुँह में लिया, चूसा। जीभ घुमाई। सिसकने लगी। “आह्ह… भैया… मत करो… कोई आ जाएगा…” शरीर धक्के दे रहा था। दूसरा भी चूसा, दाँतों से हल्का काटा। हाथ मेरे सिर पर। पैंटी गीली। नीचे हाथ बढ़ाया। जाँघों के बीच। चूत पर हल्की मालिश। और सिसकी। “नहीं… वहाँ मत…।” टाँगें थोड़ी खोल दीं।
पूरी तरह नंगा किया। गांड गोल, चिकनी, दरार साफ। बिस्तर पर लिटाया। घुटनों के बीच बैठा। चूत पर नजर। बाल साफ, गुलाबी पंखुड़ियाँ, थोड़ी गीली। नाक लगाई। गंध मीठी, मदभरी। जीभ निकाली और चाटा। ऊपर से नीचे। क्लिट पर घुमाया। कमर उठाई। “आआआह्ह्ह… भैया… क्या कर रहे हो…” और जोर से चाटा। उंगली अंदर। टाइट… बहुत टाइट। दो उंगलियाँ। अंदर की दीवारें गरम, गीली। चूत का पानी मुँह में। स्वाद नमकीन-मीठा। चाटते हुए कहा, “कितनी स्वादिष्ट चूत है तेरी… रोज चाटूंगा।” हाथों से मुँह दबाए सिसक रही थी। पंखा घूम रहा था, बिस्तर चरमरा रहा था।
69 करवाया। वो ऊपर, मैं नीचे। मुँह में मेरा लंड। आठ इंच मोटा, नसों वाला। हिचकिचाते हुए लिया। “उम्म… इतना मोटा…” गांड की दरार में जीभ डाली। छेद को चाटा। झटकी। “आह्ह… वहाँ नहीं…” जारी रखा। जीभ घुसाई। लंड और गहरा लिया। गले तक। ग्लप-ग्लप। चूत और गांड दोनों चाटे। शरीर से पसीना। कमरे में सेक्स की गंध।
फोरप्ले लंबा। बूब्स चूसना, निप्पल काटना, उंगलियाँ चूत में, गांड में एक उंगली, चाटना… सब। पूरी तरह गीली। चूत से पानी टपक रहा था। बिस्तर गीला। “भैया… अब… अब कुछ करो… सहन नहीं हो रहा…” लंड मुँह से निकाला। थूक लगाकर चूत पर रखा। धीरे धक्का। सिर्फ सुपारा अंदर। चीखी। “आआआह्ह्ह… दर्द… रुको…” खून की बूँद। कुँवारी। रुककर चूमा। “दर्द जाएगा… सहो।” धीरे-धीरे आधा। टाइट दीवारें दबा रही थीं। छप-छप शुरू। पूरा घुसाया। आँसू लेकिन कमर हिला रही थी।
पहले राउंड मिशनरी। टाँगें कंधों पर। जोर-जोर धक्के। हर धक्के पर छप-छप, थप-थप। गांड बिस्तर से टकरा रही। चूत से पानी छलक रहा। “आह्ह… भैया… और गहरा… फाड़ दो…।” गालियाँ, “साली रंडी… अपनी मौसेरी बहन की चूत चोद रहा हूँ… कितनी टाइट है।” जवाब, “हाँ… चोदो… मादरचोद… मेरी चूत तेरी हो गई…” माल अंदर झड़ने वाला तो बाहर निकाला। मुँह में। निगल लिया। झाग मुँह से। चूत से पानी अभी भी टपक रहा था। मैंने फिर चाटा। गीला-गीला।
दूसरे राउंड डॉगी। घुटनों पर। गांड ऊपर। गोल नितंब। पहले चूत में फिर से। गीली आवाजें छप-छप। फिर गांड के छेद पर। नारियल तेल लगाया। उंगली से फैलाया। दो उंगलियाँ आसानी से। “भैया… गांड में डालो… चूत से ज्यादा मजा आएगा।” सुपारा गांड में पेला। चीखी। “औछ… आह्ह… माँ… मर गई…” पीछे धक्का। तेल से आधा। और तेल टपकाया। पूरा लंड गांड में। टाइट… चूत से भी ज्यादा। दीवारें कस रही थीं। धक्के। छप-छप, धप्प-धप्प। गांड थप-थप। चूत को उंगली से रगड़ा। पागल। “आआआह्ह्ह… हाँ… फाड़ दो गांड… और जोर से… भोसड़ी के…”
बाल पकड़कर खींचे। गहरी चुदाई। लंड अंदर-बाहर। कभी पूरा बाहर, फिर जोर से अंदर। सिसक रही, आँसू और मजे के मिश्रण। कमरे में पंखे की आवाज, बिस्तर की चरमराहट, साँसें। अचानक दरवाजे के बाहर कदम। दोनों रुके। “कौन है?” कोई नहीं। डर और मजा मिलाकर और जोर। गांड में माल झाड़ दिया। गर्म लावा अंदर। बाहर निकलते टपकने लगा। उंगली से निकाला और चखा। “उम्म… स्वादिष्ट।” चूत से भी पानी निकल रहा था। बिस्तर पूरी तरह गीला।
तीसरे राउंड। गोद में बैठाया। फेस टू फेस। गांड में फिर। खुद ऊपर-नीचे। बूब्स मुँह में। चुंबन, थूक अदला-बदली। थक गई तो नीचे लिटाकर और जोर। “भैया… और नहीं… भर गया…” जारी रखा। आखिर दोनों एक साथ। उसका पानी चूत से फूटा, मेरा गांड से। छप-छप की आवाज अभी भी। पसीना, माल, चूत का पानी मिला। शरीर चिपचिपे।
बाद में पड़े रहे। टिश्यू से साफ। बाथरूम गए। वहाँ फिर ओरल। लंड साफ किया, गांड और चूत चाटी। पानी की बूंदें। कपड़े पहनते अटके। “ये बटन नहीं लग रहा।” हँसे। फिर चुप। “भैया… ये क्या हो गया हमसे? अगर किसी को पता चला…” गले लगाया। “कोई नहीं पता चलेगा। अगली बार फिर… तेरी गांड रोज मारूंगा। तुझे अपनी रंडी बनाऊंगा। चूत में भी भर दूंगा।” सिर हिलाया लेकिन मुस्कुराई। “हाँ… लेकिन सावधानी से।”
रात भर साथ। सुबह अलग जैसे कुछ न हुआ। लेकिन आँखों में वादा। परिवार के बीच खाना खाते दिल धड़कता। इज्जत का डर, गर्भावस्था का ख्याल, लेकिन वो गीला मजा भूलने वाला नहीं। चूत और गांड दोनों गीली-गीली फाड़ दी। आसान नहीं था। कई दिन, कई बार मना, डर। लेकिन आखिर हो ही गया। अब जब मिलते हैं तो आँखों में वो गीली भूख होती है।