हॉस्टल रूम में दो सहेलियों की पहली लेस्बियन चुदाई
सुनीता हमेशा कहती थी “हम दोस्त हैं, इससे आगे कुछ नहीं।” लेकिन रीया की जिद के आगे उसकी दीवार टूट गई। एक रात दोनों की चूतें आपस में रगड़ने लगीं और उंगलियाँ अंदर तक घुस गईं। आगे क्या हुआ? पूरी स्टोरी पढ़ो...
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Riya
7/30/2026
मैं रीया हूँ। इक्कीस साल की, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में तीसरे साल की स्टूडेंट। हॉस्टल में रहती हूँ, रूम नंबर २१४। मेरी सबसे करीबी दोस्त सुनीता है। वही जिसकी हँसी सुनकर पूरी क्लास मुड़ जाती है, जिसकी काली-काली आँखें और गोल-मटोल चेहरा देखकर लड़के पागल हो जाते हैं। लेकिन मैं... मैं तो दिन-रात सिर्फ उसी के बारे में सोचती रहती हूँ। उसकी लंबी टाँगें, टाइट जींस में फंसे गोल नितंब, और वो सफेद सलवार-कमीज जिसमें उसके दूध जैसे स्तन हल्के-हल्के काँपते दिखते हैं।
हम तीन साल से साथ हैं। लाइब्रेरी, कैंटीन, लेट नाइट वॉक... सब कुछ साथ। लेकिन मेरे अंदर जो आग जल रही थी, वो किसी को नहीं पता थी। सुनीता सीधी-सादी लड़की है। घरवाले सख्त, गाँव से आई हुई। वो हमेशा कहती — “रीया, हम दोनों दोस्त हैं। इससे आगे कुछ नहीं होना चाहिए।” लेकिन मेरी नींद उड़ चुकी थी। रात को मैं अपने बिस्तर पर लेटकर उसकी कल्पना करती — उसकी चूत की गंध, उसके निप्पल्स को मुँह में लेना, उसकी जाँघों के बीच अपनी उंगलियाँ घुसाना।
पहली बार जब मैंने कोशिश की, तब हम दोनों हॉस्टल के कॉमन रूम में प्रोजेक्ट पर बैठे थे। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था, बाहर गली में कुत्तों की आवाज़ आ रही थी। सुनीता का सर मेरे कंधे पर झुक गया था। मैंने हल्के से उसके बालों में उंगलियाँ फेर दीं।
“सुनीता... तेरे बाल कितने मुलायम हैं।”
वो हल्के से मुस्कुराई। “अरे यार, सोने दे। कल क्लास है।”
मैंने और हिम्मत करके अपना हाथ उसके कंधे पर रखा, फिर धीरे-धीरे उसकी बाजू को सहलाया। उसकी त्वचा गर्म थी। मेरे अंदर कुछ काँप उठा। मैंने उसके कान के पास फुसफुसाया —
“सुनीता... मुझे तेरे करीब रहने में अच्छा लगता है। बहुत अच्छा।”
वो अचानक सीधी हो गई। “रीया... ये क्या बातें कर रही है तू? हम दोस्त हैं। ऐसी बातें... ठीक नहीं।”
उसने अपना बैग उठाया और जल्दी से रूम की तरफ चली गई। मैं वहीं बैठी रह गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। अंदर से गुस्सा भी आ रहा था और शर्म भी। “मैं क्या कर रही हूँ? ये मेरी सबसे अच्छी दोस्त है...” लेकिन रात भर मैंने उसी के बारे में सोचा। अपनी उंगलियों से अपनी चूत सहलाते हुए उसकी कल्पना की — उसकी गीली चूत, उसकी सिसकारियाँ।
दूसरे दिन लाइब्रेरी में मिला। सुनीता किताबों के बीच बैठी थी। मैंने उसके बगल में जगह बनाई। जानबूझकर अपना घुटना उसके घुटने से छुआ। वो थोड़ा हट गई।
“रीया, थोड़ी जगह छोड़ दे न।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा — “क्या हुआ? डर गई क्या?”
वो गुस्से में बोली — “ऐसी बातें मत कर। कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा? कॉलेज में नाम खराब हो जाएगा।”
मैंने उसकी किताब बंद कर दी और उसकी आँखों में देखा। “सुनीता, मैं सिर्फ तुझे छूना चाहती हूँ। तेरे बाल, तेरी बाँहें... बस इतना ही। कुछ गलत नहीं करूँगी।”
वो खड़ी हो गई। “रीया, प्लीज। मैं घर जाऊँगी इस वीकेंड। माँ-पापा को पता चल गया तो...” उसने बात अधूरी छोड़ दी और भाग गई। मैं लाइब्रेरी में बैठी रही। अंदर से जलन हो रही थी। रात को फिर अकेली मुठ मारी। इस बार और जोर से। कल्पना में मैं उसकी चूत चाट रही थी, उसकी जाँघें मेरे सिर के दोनों तरफ थीं।
तीसरे दिन कैंटीन में बैठी थी। सुनीता आई। चेहरा थोड़ा उदास। मैंने पूछा — “क्या हुआ?”
वो बोली — “घर से फोन आया। पापा कह रहे हैं जल्दी शादी करवा देंगे। मुझे और पढ़ना है रीया... मुझे डर लग रहा है।”
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार उसने नहीं हटाया। “मैं हूँ न तेरे साथ। तू अकेली नहीं है।”
हम देर रात तक बात करते रहे। हॉस्टल के गार्डन में। ठंडी हवा चल रही थी। सुनीता का सिर मेरे कंधे पर था। मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ा और अपनी हथेली में रखा। उसका हाथ काँप रहा था। मैंने अपने होंठ उसके माथे पर रख दिए।
“सुनीता... मुझे तुझसे प्यार हो गया है।”
वो अचानक पीछे हट गई। “रीया! ये क्या बकवास कर रही है तू? हम लड़कियाँ हैं। ये... ये गलत है। बहुत गलत।”
उसने आँसू पोंछे और भाग गई। मेरे दिल में छुरा सा घुस गया। लेकिन इच्छा और बढ़ गई थी। रात भर मैं करवटें बदलती रही। सुनीता की गोल गांड, उसके टाइट स्तन... सब कुछ आँखों के सामने घूम रहा था।
चौथे दिन मैंने और हिम्मत की। रात को उसके रूम में चली गई। दरवाजा खुला था। वो बेड पर लेटी थी, मोबाइल चला रही थी। मैंने दरवाजा बंद कर दिया और उसके पास बैठ गई।
“सुनीता, बात करनी है।”
वो उठी। “रीया, अब क्या है? मैं थक गई हूँ।”
मैंने उसका हाथ पकड़ा। इस बार जोर से। “मैं तुझे चाहती हूँ। तेरे शरीर को, तेरी साँसों को... सब कुछ। तू मुझे धकेल सकती है, लेकिन मैं रुकने वाली नहीं।”
वो खड़ी हो गई। आँखों में गुस्सा और डर दोनों थे। “रीया, छोड़ दे मेरा हाथ। मैं तेरी दोस्त हूँ, प्रेमिका नहीं। अगर कोई सुन लेगा तो... मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। घरवाले मुझे घर से निकाल देंगे।”
मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। “तो फिर मुझे धक्का दे। चिल्ला। लेकिन मैं जाने वाली नहीं।”
वो काँप रही थी। आँसू आ गए उसकी आँखों में। “रीया... प्लीज... ये मत कर। मैं डर गई हूँ।”
मैंने उसे छोड़ दिया। बाहर निकल आई। गलियारे में खड़ी होकर साँस ले रही थी। अंदर से टूट चुकी थी, लेकिन इच्छा और तेज हो गई थी। अगले दो दिन मैंने उससे बात नहीं की। वो भी बचती रही। लेकिन दोनों के अंदर की आग बढ़ती जा रही थी।
फिर एक रात आई। बारिश हो रही थी। हॉस्टल में बिजली चली गई। अंधेरा था। मैं उसके रूम में चली गई मोमबत्ती लेकर। वो बिस्तर पर बैठी थी। मैंने मोमबत्ती टेबल पर रखी और उसके पास बैठ गई।
“सुनीता... अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा।”
वो चुप थी। मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। “एक बार मुझे चूम लेने दे। बस एक बार। उसके बाद जो चाहे कर लेना।”
उसकी आँखें मेरे होंठों पर थीं। साँस तेज हो रही थी। “रीया... मैं... मैं नहीं...”
मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहले तो वो सख्त रही, फिर धीरे-धीरे उसके होंठ नरम पड़ गए। मैंने जीभ से उसके होंठ सहलाए। उसने हल्की सी सिसकारी ली। “उम्म...”
मैंने और गहरा चुंबन लिया। मेरी जीभ उसके मुँह में घुस गई। थूक मिला हुआ, गर्म। सुनीता की साँसें तेज हो गईं। उसके हाथ मेरे कंधों पर थे, लेकिन धक्का नहीं दे रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर और जोर से चूमा। हमारी जीभें लड़ रही थीं। कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज़ और हमारी साँसें थीं।
“आह्ह... रीया...”
मैंने उसके कमीज के बटन खोले। एक-एक करके। उसके सफेद ब्रा में बंद दूध जैसे स्तन बाहर आ गए। मैंने दोनों हाथों से उन्हें सहलाया। गोल, भारी, निप्पल्स तने हुए। मैंने मुँह लगा दिया। जीभ से एक निप्पल को घुमाया, फिर दाँतों से हल्का काटा।
“आआआह्ह्ह... रीया... रुको... ये... ये गलत है...”
लेकिन उसकी आवाज़ में विरोध कम और मजा ज्यादा था। मैंने दूसरा स्तन भी मुँह में ले लिया। चूसने लगी। उसकी कमर ऐंठ रही थी। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रखा। वो गीली हो चुकी थी। सुनीता की उंगलियाँ काँप रही थीं, लेकिन उसने हटाया नहीं।
मैंने उसकी सलवार का नाड़ा खोला। धीरे-धीरे नीचे खींचा। उसके गुलाबी पैंटी में गीलापन साफ दिख रहा था। मैंने नाक पास लाकर सूँघा। “सुनीता... तेरी चूत की खुशबू... पागल कर रही है।”
वो शर्म से मुँह छुपा रही थी। “रीया... मत देख... प्लीज...”
मैंने पैंटी भी उतार दी। उसकी चूत साफ मुंडवाई हुई थी, गुलाबी, गीली, फटी हुई। मैंने दोनों जाँघें फैला दीं। उंगली से उसके क्लिटोरिस को सहलाया। वो झटके से काँपी।
“आआआह्ह्ह्ह... रीया...”
मैंने धीरे-धीरे एक उंगली अंदर घुसाई। गर्म, टाइट, गीली दीवारें। सुनीता की कमर ऊपर उठी। मैंने दूसरी उंगली भी डाली। अंदर-बाहर करने लगी। छप-छप की आवाज़ आने लगी। उसकी चूत का पानी मेरी उंगलियों पर चिपक रहा था।
“आह्ह... और... और अंदर... उउउउह्ह्ह...”
मैंने अपना मुँह उसकी चूत पर रख दिया। जीभ से क्लिटोरिस चाटा। ऊपर-नीचे, गोल-गोल। उसकी जाँघें मेरे सिर को जकड़ रही थीं। मैंने उंगलियाँ और तेज कीं। तीन उंगलियाँ अंदर। उसकी चूत की दीवारें सिकुड़ रही थीं।
“रीया... मैं... मैं आने वाली हूँ... आआआह्ह्ह्ह...”
मैंने और जोर से चाटा। उसकी चूत से पानी निकल रहा था, मेरे मुँह में। स्वाद नमकीन-मीठा। मैंने पूरा निगल लिया। सुनीता का शरीर ऐंठ गया। वो जोर से चीखी —
“आआआआह्ह्ह्ह... रीया... बस... आआआह्ह्ह...”
उसका पानी मेरे चेहरे पर लग गया। मैंने उंगलियाँ निकालीं और उसके मुँह के पास ले गई। “चाट... अपनी चूत का पानी चाट।”
वो काँपते हुए मेरी उंगलियाँ मुँह में ले गई। चूसने लगी। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन मजा साफ दिख रहा था।
मैंने उसे पलटा। उसकी गांड ऊपर। गोल, चिकनी। मैंने जीभ से उसकी गांड की दरार भी चाटी। वो और जोर से काँपी।
“रीया... वहाँ... मत... आआआह्ह्ह...”
मैंने फिर उसकी चूत में उंगलियाँ घुसा दीं। इस बार और तेज। छप-छप, छप-छप। उसकी गांड थप-थप कर रही थी। मैंने अपना चेहरा उसकी गांड में दबा दिया। साँसें फूल रही थीं।
सुनीता अब पूरी तरह से भीग चुकी थी। वो खुद अपनी कमर हिला रही थी। “रीया... और तेज... मेरी चूत फाड़ दे अपनी उंगलियों से... आआआह्ह्ह्ह...”
मैंने चार उंगलियाँ अंदर कर दीं। उसकी चूत खुल गई थी। पानी बह रहा था। बिस्तर गीला हो चुका था। मैंने अपना मुँह फिर चूत पर लगा दिया। जीभ अंदर तक घुसाई। सुनीता की सिसकारियाँ पूरे कमरे में गूँज रही थीं। बारिश बाहर जोर से पड़ रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ें उस पर भारी पड़ रही थीं।
“हां... हां... और... और गहरा... उउउउह्ह्ह... रीया मैं पागल हो जाऊँगी...”
मैंने उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। पूरा मुँह चूत में धंस गया। चाटते-चाटते मेरी ठोड़ी गीली हो गई। सुनीता के नाखून मेरे बालों में धंस गए। वो मेरे सिर को और जोर से दबा रही थी।
अचानक उसकी चूत जोर से सिकुड़ी। पानी की धार निकली। स्क्विश-स्क्विश। मैंने पूरा पी लिया। उसका शरीर काँप रहा था, साँसें फूल रही थीं।
“रीया... काफी... अब... बस...”
लेकिन मैं रुकी नहीं। मैंने उसे अपनी तरफ खींचा। उसकी चूत मेरी चूत से सटा दी। दोनों गीली चूतें रगड़ने लगीं। स्क्विश-स्क्विश की आवाज़। हमारी निप्पल्स आपस में छू रहे थे। मैंने उसके होंठ फिर चूस लिए। थूक मिला हुआ चुंबन।
“सुनीता... तेरी चूत मेरी चूत से मिल रही है... महसूस कर...”
वो अब खुद रगड़ रही थी। कमर आगे-पीछे। दोनों की चूतें चिपक रही थीं। पानी मिला हुआ। मैंने उसकी गांड पकड़कर और जोर से दबाया।
“आआआह्ह्ह्ह... रीया... और जोर... फाड़ दे मुझे...”
हम दोनों एक साथ काँप उठे। पानी और निकला। बिस्तर पूरी तरह गीला। पसीना बह रहा था। कमरे में मोमबत्ती की रोशनी में हमारी गीली शरीर चमक रहे थे।
मैंने फिर से उंगलियाँ उसकी चूत में डालीं। इस बार बहुत तेज। सुनीता की आवाज़ टूट रही थी।
“आह्ह... रीया... मैं... फिर से... आआआह्ह्ह्ह...”
तीसरी बार वो आई। इस बार और जोर से। उसका शरीर मेरे ऊपर गिर गया। हम दोनों पसीने से लथपथ थे। साँसें भारी। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज़ और हमारी हांफने की आवाज़ें थीं।
सुनीता की आँखों में आँसू थे। “रीया... हमने क्या कर दिया... ये... ये गलत था...”
मैंने उसके बाल सहलाए। “गलत नहीं था। बहुत सही था। तेरी चूत अभी भी मेरे मुँह का स्वाद ले रही है।”
वो चुप रही। मैंने टिश्यू निकाला और उसकी चूत साफ की। गीलापन अभी भी बह रहा था। कपड़े पहनने में दिक्कत हो रही थी। सलवार चिपक रही थी। सुनीता के स्तन अभी भी तने हुए थे।
“रीया... कल... फिर से आना। लेकिन धीरे से... कोई सुन न ले।”
मैं मुस्कुराई। “कल तेरी गांड भी चाटूंगी। और अगली बार अपनी चूत तेरे मुँह में डालूँगी।”
सुनीता की आँखें बड़ी हो गईं, लेकिन उसने मना नहीं किया। बाहर बारिश थम चुकी थी। गलियारे में सन्नाटा था। मैं अपने रूम की तरफ बढ़ी। पैर काँप रहे थे। अंदर से संतुष्टि थी, लेकिन डर भी। कॉलेज में अगर किसी को पता चल गया... लेकिन अब पीछे मुड़ने का मन नहीं था।
रात भर सुनीता की गीली चूत की याद आती रही। उसकी सिसकारियाँ, उसका पानी, उसकी गांड की गर्माहट। सुबह उठते ही मैंने फिर मुठ मारी। इस बार और जोर से। क्योंकि अब मैं जान गई थी — सुनीता भी उतनी ही भूखी है जितनी मैं।