कजिन सिस्टर के साथ एक कम्बल में फिंगरिंग
रात भर एक ही बेड पर लेटे-लेटे उंगलियों से उसकी चूत भिगो दी, चुम्बन लिए… फिर ओयो रूम में पूरी रात चोदा।
SEX STORIES IN HINDI
Ajay
7/28/2026
मैं अजय, चौबीस साल का हूँ। दिल्ली के पूर्वी इलाके में एक छोटे से दो कमरों वाले किराए के फ्लैट में रहता हूँ। पापा सरकारी दफ्तर में क्लर्क हैं, मम्मी घर का सारा काम संभालती हैं। घर संकरा है। एक कमरा पापा-मम्मी का, दूसरा मेरा। कॉलेज खत्म हुए सात महीने हो चुके थे। जॉब के इंटरव्यू घूम रहा था पर कुछ पक्का नहीं हुआ था। जिंदगी बिल्कुल साधारण और नीरस चल रही थी जब तक मेरी कजिन प्रिया घर नहीं आई।
प्रिया मेरी मामा की इकलौती बेटी। उम्र इक्कीस साल। पटना से बीए द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही थी। मामा की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने कहा कि तनाव कम करने के लिए कुछ दिनों दिल्ली चली जाए। मामा ने फोन पर रोते हुए कहा कि प्रिया को दो-तीन हफ्ते के लिए हमारे पास भेज रहे हैं। घर में जगह नहीं थी इसलिए मेरा कमरा दोनों को शेयर करना पड़ा। एक पुराना डबल बेड, एक मोटा सूती कम्बल, एक पुराना पंखा और एक छोटी खिड़की। पहली बार जब वो पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से उतरी तो मैंने ही ऑटो लेकर उसे लेने गया था।
स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जब वो भीड़ में से निकली तो मेरी साँस एक पल के लिए रुक गई। लंबी, गोरी चमड़ी, काले घने बाल जो कमर तक लहरा रहे थे। हल्की गुलाबी सलवार कमीज पहनी हुई थी। कमीज थोड़ी टाइट थी। आगे से दूध की गोल-गोल शक्ल साफ उभर रही थी। गोल और भारी बूब्स। जांघें मोटी और नरम। पीछे से गांड गोल और ऊपर को उठी हुई। बड़ी-बड़ी काली आँखें। गुलाबी मोटे होंठ। मैंने मन ही मन सोचा, “ये तो मेरी सगी बहन जैसी है... पर आँखें हट ही नहीं पा रही हैं।” अंदर लंड हल्का सा तन गया। मैंने जल्दी से नजरें फेर लीं और मुस्कुराते हुए बोला, “आ गई प्रिया। कैसे हो?”
घर पहुँचकर मम्मी ने गर्म रोटियाँ और दाल लगाई। प्रिया चुपचाप बैठी रही। खाने के दौरान उसकी नजरें बार-बार नीचे झुकी रहतीं। खाना खत्म होने के बाद वो मेरे कमरे में आई। अपना छोटा सा बैग रखा। नाइट ड्रेस निकाली। पतली सफेद कॉटन की। मैं बहाने से बाहर चला गया। जब वापस आया तो वो बेड के किनारे बैठी थी। नाइट ड्रेस में निप्पल की नुकीली नोक साफ दिख रही थी। मैंने दीवार की तरफ मुँह करके लेटा। कम्बल दोनों पर डाला। बीच में एक मोटा तकिया रख दिया ताकि छूने का मौका न बने। पंखा धीमी स्पीड पर चल रहा था। बाहर गली में कुत्तों की भौंक और किसी के घर से टीवी सीरियल की आवाज आ रही थी।
मैंने हल्के से पूछा, “प्रिया... ठंड तो नहीं लग रही रात में?”
उसने जवाब दिया, “नहीं भैया... बस ऐसे ही आदत है।”
मैंने कम्बल थोड़ा अपनी तरफ खींचा। उसका हाथ मेरे हाथ से हल्का सा छू गया। दिल जोर से धड़क उठा। मैंने अंदर सोचा, “अगर हाथ पकड़ लूँ तो क्या होगा?” पर हिम्मत नहीं जुटा पाया। वो धीरे-धीरे सो गई। उसकी साँसें नियमित हो गईं। मैंने दीवार की तरफ मुँह करके लेटा और आँखें बंद कीं। लंड पूरा तन चुका था। पैंट में तंग महसूस हो रहा था। रात भर मैं दो बार बाथरूम गया। दोनों बार मुठ मारी। प्रिया के गोल बूब्स और मोटी जांघों की तस्वीर आँखों के सामने घूमती रही। माल निकलते समय मैंने होंठ दबा लिए ताकि आवाज न निकले।
सुबह वो बाथरूम गई। मैंने देखा उसकी नाइट ड्रेस पीछे से पसीने से हल्की गीली हो गई थी। जांघों के बीच की जगह पर कपड़ा चिपक रहा था। मैंने जल्दी से नजरें फेर लीं। दिन भर घर में मम्मी रहीं। मैंने कोई हिम्मत नहीं दिखाई। बस दूर से देखा।
दूसरे दिन दोपहर को मम्मी सब्जी लेने बाजार चली गईं। घर बिल्कुल खाली। प्रिया टीवी पर कोई पुराना सीरियल देख रही थी। मैं उसके पास सोफे पर बैठ गया।
“प्रिया... कॉलेज कैसा चल रहा है पटना में? दोस्त कैसे हैं? पढ़ाई का बोझ तो नहीं?”
“ठीक है भैया... पर घर की याद बहुत आती है। पापा की तबीयत की वजह से मन बिल्कुल नहीं लग रहा। रात को नींद कम आती है।”
मैंने थोड़ी देर और बात की। उसके बचपन की बातें पूछीं। मामा के घर की यादें। वो धीरे-धीरे खुलने लगी। फिर मैंने हल्के से उसका कंधा छुआ। “तुम थक गई लग रही हो। कंधे दबाने दूँ थोड़े?”
उसने कंधा झटके से हटा लिया। “अजय भैया... ऐसे मत करो। हम कजिन हैं। ऐसी बातें ठीक नहीं।”
मैंने हाथ वापस खींच लिया। अंदर गुस्सा और तीव्र हसरत दोनों एक साथ उठे। मैंने सोचा, “इतनी जल्दी नहीं चलेगा। धीरे-धीरे ही करना पड़ेगा।” रात को फिर एक ही कम्बल में लेटे। इस बार मैंने जान-बूझकर अपना पैर उसके पैर से सटा दिया। वो हिली नहीं। मैंने धीरे-धीरे पैर ऊपर सरकाया। जांघ छू गई। नरम और गरम। लंड और ज्यादा सख्त हो गया। उसने पैर हटा लिया और कम्बल अपनी तरफ खींच लिया।
“सो जाओ भैया। मत करो ऐसा।”
मैंने मन मार लिया। सुबह तक नींद नहीं आई। बाथरूम में जाकर फिर मुठ मारी। इस बार प्रिया के नाम लेकर।
तीसरे दिन शाम को दोनों छत पर बैठे थे। हल्की हवा चल रही थी। पड़ोसी के घर से बच्चों की हंसी और बर्तन माँजने की आवाज आ रही थी। सूरज ढल रहा था।
“प्रिया... तुम आज बहुत सुंदर लग रही हो। ये हल्की सलवार तुम पर बहुत अच्छी लगती है। बाल ऐसे खुले रखने से और प्यारी लगती हो।”
“भैया... ऐसी बातें मत करो। गलत लगती हैं। घर वाले अगर सुन लें तो क्या कहेंगे। हम कजिन हैं याद है ना?”
“मैं... मैं सिर्फ तारीफ कर रहा था। कुछ गलत मंशा नहीं थी। तुम सच में सुंदर हो।”
उसने बात काट दी, “नहीं। ऐसी बातें कजिन भाई के साथ नहीं होनी चाहिए। पापा की तबीयत खराब है, मैं यहाँ आराम और थोड़ा मन बदलने आई हूँ। गंदी बातें मत करो।”
मैंने चुप रहना ही ठीक समझा। रात को बेड पर लेटे तो मैंने कम्बल के अंदर हाथ बढ़ाया। उसका हाथ पकड़ा। उसने जोर से छुड़ा लिया।
“सो जाओ अजय। मत छुओ मुझे। नींद आ रही है।”
चौथे दिन सुबह मम्मी-पापा दोनों रिश्तेदारों के घर हरिद्वार जाने वाले थे। दो दिन के लिए। घर पूरी तरह खाली रहने वाला था। मैंने मन में ठान लिया कि आज जरूर कुछ आगे बढ़ाना है। दिन भर प्रिया से बातें कीं। उसकी पढ़ाई के बारे में, पटना के दोस्तों के बारे में, भविष्य की नौकरी के बारे में। वो थोड़ी नरम पड़ी। शाम को खाना खाकर दोनों कमरे में आए। लाइट बंद कर दी। पंखा मध्यम स्पीड पर चल रहा था। बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी। छत पर पानी की टप-टप आवाज साफ सुनाई दे रही थी। गली में कोई रिक्शा वाला सायरन बजा रहा था।
मैंने कम्बल के अंदर हाथ बढ़ाया। इस बार उसका हाथ पकड़कर धीरे से अपनी तरफ खींचा। “ठंड लग रही है। पास आ जाओ थोड़ा। कम्बल छोटा पड़ रहा है।”
उसने कुछ नहीं कहा। बस साँसें थोड़ी तेज हो गईं। मैंने उसका हाथ अपनी जांघ पर रखा। लंड पूरा तना हुआ था। पैंट के ऊपर से उसकी हथेली को महसूस हो रहा था। उसने हाथ हटाया।
“प्रिया... एक बार सिर्फ... कोई नहीं है घर में।”
“नहीं भैया... गलत है। हम भाई-बहन जैसे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। पाप लगेगा। घर की इज्जत...”
मैंने फिर से हाथ बढ़ाया। इस बार उसकी कमर पर। नाइट ड्रेस के ऊपर से। उसकी कमर पतली और गरम थी। साँसें और तेज हो गईं। मैंने धीरे-धीरे हाथ ऊपर सरकाया। बूब्स के ठीक नीचे तक। नरम मांस महसूस हुआ।
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “रुको... मत करो अजय। डर लग रहा है। अगर कोई अचानक आ गया तो...”
“बस थोड़ा सा... कोई नहीं आएगा। मम्मी-पापा कल शाम तक नहीं लौटेंगे। तुम भी चाहती हो ना? कल रात तुम्हारी साँसें तेज हो रही थीं।”
मैंने उसका मुँह अपनी तरफ घुमाया। होंठ बहुत पास आ गए। पहली किस। हल्की और डरभरी। उसके होंठ नरम, गरम और थोड़े सूखे थे। मैंने जीभ अंदर डाली। थूक मिलाया। उसने पहले विरोध किया। होंठ कसकर बंद किए। गर्दन पीछे खींची। फिर धीरे-धीरे जवाब देने लगी। लंबी और गीली किस। दोनों की साँसें उलझ गईं। थूक दोनों के मुँह में मिलकर बहने लगा।
कम्बल के अंदर मेरा हाथ उसके ब्लाउज के नीचे चला गया। बूब्स गोल, मोटे और बहुत नरम। निप्पल तने हुए और सख्त। मैंने उंगली से धीरे-धीरे घुमाया। “आह्ह...” उसकी दबी हुई आवाज निकली।
“प्रिया... ये दूध कितने सॉफ्ट और भारी हैं। कितने गोल-गोल। हाथ में आते ही मन कर रहा है चूस लूँ।”
“भैया... बंद करो न... कोई आ जाएगा... पाप लगेगा हमें... छोड़ो...”
मैंने दूसरी तरफ हाथ बढ़ाया। पैंटी के ऊपर से चूत को दबाया। पूरी गीली थी। गर्म और नरम। मैंने एक उंगली अंदर डाली। धीरे से। उसकी चूत गरम, टाइट और गीली। दो उंगलियाँ। अंदर-बाहर धीरे-धीरे। छप-छप की हल्की गीली आवाज कम्बल के नीचे से आने लगी।
“उउउह्ह्ह... अजय... मत... निकालो उंगली... डर लग रहा है...”
मैंने किस जारी रखी। थूक उसके मुँह में छोड़ा। निप्पल को मुँह में लिया और चूसा। ब्लाउज ऊपर कर दिया। दोनों दूध मुँह में एक-एक करके लिए। दाँत से हल्का काटा। जीभ से गोल-गोल घुमाया। उसकी कमर उछलने लगी। जांघें काँपने लगीं।
“आह्ह्ह... भैया... रुको... साँस नहीं आ रही... धीरे...”
मैंने फिंगरिंग तेज कर दी। अंदर क्लिट पर उंगली घुमाने लगा। उसकी जांघें मेरे हाथ को जोर से दबा रही थीं। पानी और तेजी से निकलने लगा। कम्बल गीला होने लगा। मैंने दूसरी उंगली गांड की दरार पर लगाई। हल्का दबाया। अंदर नहीं घुसाया। सिर्फ दबाव दिया।
“आआआह्ह्ह्ह... नहीं... वहाँ मत लगाओ... अह्ह...”
मैंने लंड निकाला। पैंट का जिप खोला और लंड बाहर निकाला। उसका हाथ पकड़कर लंड पर रखा। उसने पहले जोर से मना किया। हाथ हटाया। फिर धीरे-धीरे पकड़ लिया। ऊपर-नीचे हिलाने लगी। मैंने उसकी चूत में तीन उंगलियाँ ठोक दीं। छप-छप की आवाज जोर से होने लगी। कम्बल के नीचे गीलापन फैल रहा था।
“प्रिया... कितनी गीली हो गई है तेरी चूत। देखो पानी कैसे निकल-निकल कर मेरी हथेली गीली कर रहा है। खुशबू भी आ रही है।”
“उम्म... बंद करो... डर लग रहा है... अगर कोई सुन ले तो... अह्ह...”
मैंने उसके मुँह पर हल्के से हाथ रखा। फिंगरिंग जारी रखी। उसकी सिसकारियाँ दबी-दबी निकल रही थीं। अचानक उसका पूरा शरीर काँप उठा। जांघें तन गईं। पानी जोर से छूट गया। मेरी पूरी हथेली और कलाई गीली हो गई। मैंने उंगलियाँ मुँह में ले जाकर चूस लीं। चूत की तेज खुशबू और नमकीन-मीठा स्वाद।
“अजय... ये क्या कर दिया तुमने... मैं... मैं अब क्या करूँ... शर्म आ रही है...”
मैंने उसे कसकर गले लगाया। सीने से सटा लिया। “कल... कल कुछ और करेंगे। आज बस इतना। तुम भी मजा ले रही थी ना?”
उसने सिर हिलाया। आँखों में पानी था। “नहीं... फिर कभी नहीं। ये बहुत गलत है। हम कजिन हैं। घर की इज्जत दांव पर लग जाएगी। पापा की तबीयत खराब है...”
सुबह वो मुझसे बिल्कुल बात नहीं कर रही थी। दिन भर बच-बचकर रही। कमरे में आते-जाते नजरें फेर लेती। मैंने सोचा शायद सब खत्म हो गया। पर शाम को जब दोनों अकेले छत पर मिले तो उसकी आँखों में वही भूख साफ दिख रही थी। डर के साथ मिली हुई।
पाँचवें दिन सुबह मम्मी-पापा वापस आ गए। घर में फिर हलचल हो गई। मैंने प्रिया से सीधे कोई बात नहीं की। पर दोपहर को जब वो छत पर कपड़े सुखाने गई तो मैं भी कपड़े लेकर चला गया।
“प्रिया... कल रात वाली बात... अगर गलत लगा हो तो माफ कर देना। मैं खुद को रोक नहीं पाया।”
“भैया... भूल जाओ वो सब। फिर कभी मत करना। वरना मैं घर वापस चली जाऊँगी। पापा को फोन करके बोल दूँगी।”
“ठीक है। जैसा तुम कहोगी। मैं कुछ नहीं करूँगा।”
रात को बेड पर लेटे तो मैंने कोई कोशिश नहीं की। सिर्फ कम्बल शेयर किया। बीच में तकिया फिर रख दिया। पर अंदर लंड पूरी रात तना रहा। मैंने दो बार बाथरूम जाकर मुठ मारी। दोनों बार प्रिया के गीले बूब्स और फिंगरिंग की याद में। माल निकलते समय दीवार पकड़नी पड़ी।
छठे दिन दोपहर को घर फिर खाली हुआ। मम्मी मंदिर गई थीं। पापा दफ्तर। मैंने फिर से कोशिश की। प्रिया किताब लेकर बेड पर बैठी पढ़ रही थी। मैं उसके पास बैठ गया।
“प्रिया... तुम्हें पटना वापस कब जाना है? दो हफ्ते और रहोगी क्या?”
“शायद दो हफ्ते और। पापा की तबीयत धीरे-धीरे ठीक हो रही है। डॉक्टर ने आराम करने को कहा है।”
मैंने बात आगे बढ़ाई। उसकी पढ़ाई, पटना के दोस्त, भविष्य की नौकरी की बातें। वो खुल गई। फिर मैंने हल्के से उसका हाथ पकड़ा। “कल रात... तुम्हें थोड़ा मजा तो आया था ना? तुम्हारी चूत इतनी गीली हो गई थी।”
उसने हाथ झटके से छुड़ाया। “नहीं... मत पूछो वो बात। गलत था सब। भूल जाओ।”
“पर तुम्हारी चूत इतनी गीली हो गई थी कि पानी निकल आया था। खुशबू अभी भी याद है।”
“अजय! चुप रहो। ऐसी गंदी और शर्मनाक बातें मत करो। अगर किसी ने सुन लिया तो...”
मैंने रुक गया। पर शाम को जब दोनों अकेले कमरे में थे और लाइट बंद हो गई तो मैंने फिर से कम्बल के अंदर हाथ बढ़ाया। इस बार उसने खुद मेरा हाथ पकड़ लिया और लंड की तरफ ले गई। “बस थोड़ा... सिर्फ हाथ से... और कुछ नहीं... डर लग रहा है...”
मैंने फिंगरिंग शुरू की। बहुत लंबी और धीमी। बूब्स को पूरी तरह चूसा। निप्पल काटे। चूत को कम्बल के नीचे चाटा। जीभ अंदर तक डाली। उसकी जांघें मेरे सिर को जोर से दबा रही थीं। बालों को पकड़ लिया उसने। “आह्ह्ह... और... जीभ वहाँ... हाँ...”
मैंने लंड उसके मुँह में ठोका। पूरा अंदर। गले तक। उसने गैग किया। थूक लंड पर बह निकला। आँखों में पानी आ गया। मैंने फिर वापस फिंगरिंग की। वो दो बार जोर से झड़ गई। पानी कम्बल पर फैल गया। बेड थोड़ा गीला हो गया।
“भैया... अब और नहीं... डर लग रहा है घर में। कोई आ सकता है...”
मैंने कहा, “कल ओयो चलते हैं। पूरा कर लेंगे। वहाँ कोई नहीं आएगा। पूरा दिन और रात हमारे पास होगी।”
“ओयो? पागल हो गए हो क्या तुम? अगर किसी ने देख लिया या शक हो गया तो... परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी... पापा...”
“कोई नहीं देखेगा। मैंने पहले से सोच रखा है। एक दिन। सिर्फ हम दोनों। तुम भी चाहती हो। तुम्हारी आँखें बोल रही हैं।”
सातवें दिन सुबह मैंने मोबाइल पर ओयो ऐप खोलकर एक साफ-सुथरा रूम बुक कर लिया। दोपहर में दोनों घर से निकले। घर वालों को कहा कि कॉलेज के ग्रुप प्रोजेक्ट के काम से बाहर जा रहे हैं। होटल पहुँचे। तीसरी मंजिल का कोना वाला रूम। बड़ा बेड। एसी तेज चल रहा था। खिड़की पर मोटा पर्दा। दरवाजा डबल लॉक किया। बाहर कॉरिडोर में किसी के कदमों की आवाज आई फिर चुप्पी छा गई। कमरे में सिर्फ एसी की धीमी आवाज थी।
प्रिया दरवाजे के पास खड़ी थी। डर और तीव्र हसरत दोनों आँखों में साफ दिख रहे थे। सलवार कमीज अभी भी पहने हुए। मैंने उसे दीवार से लगाकर जोर से किस किया। बहुत लंबी। थूक मिलाया। जीभ अंदर-बाहर की। उसके होंठ काँप रहे थे। मैंने धीरे-धीरे कपड़े उतारने शुरू किए। पहले दुपट्टा। फिर कमीज के बटन एक-एक करके खोले। ब्लाउज खुला। ब्रा का हुक खोला। दोनों दूध बाहर आ गए। गोल, मोटे, भारी। निप्पल काले और पूरी तरह तने हुए।
“आह्ह्ह... धीरे... ठंड लग रही है एसी से...”
मैंने दोनों दूध हाथों में लिए। मुँह में एक निप्पल लिया और जोर से चूसा। दाँत से हल्का काटा। जीभ से गोल-गोल घुमाया। दूसरा भी वैसा ही। सिर्फ बूब्स पर बीस मिनट से ज्यादा समय लगाया। उसकी साँसें बहुत तेज हो गईं। कमर हिलने लगी। मैंने बूब्स के नीचे चाटा। पेट पर। नाभि के आसपास। फिर सलवार का नाड़ा खोला। नीचे गिराया। पैंटी गुलाबी रंग की। बीच में गहरा गीला धब्बा पड़ चुका था। मैंने पैंटी धीरे से उतारी। चूत बालों वाली। थोड़े लंबे काले बाल। पूरी गीली और चमक रही थी। गुलाबी पंखुड़ियाँ सूजी हुई। मैंने घुटनों के बल बैठकर चूत को पास से सूँघा। तेज और मदहोश करने वाली खुशबू। मछली जैसी और मीठी मिली-जुली। जीभ लगाई। क्लिट पर। बहुत लंबा और धीरे-धीरे चाटा। अंदर-बाहर। दो उंगलियाँ भी साथ में। छप-छप की गीली आवाज। उसकी जांघें मेरे सिर को जोर से दबा रही थीं। बाल पकड़ लिए उसने।
“आआआह्ह्ह्ह... अजय... जीभ और अंदर डालो... वहाँ... हाँ... बस वहीं...”
मैंने बहुत लंबे समय तक चाटा। लगभग आधा घंटा। उसकी चूत से पानी लगातार बह रहा था। मेरे मुँह में, ठोड़ी पर, गर्दन तक। मैंने उंगलियाँ सूँघीं फिर चूसीं। स्वाद नमकीन और मीठा। फिर लंड निकाला। उसका मुँह खोला और लंड अंदर ठोका। गले तक। उसने आँखें बंद करके चूसा। ग्लप-ग्लप की आवाज। थूक लंड पर बह रहा था। मैंने बाल पकड़कर धीरे-धीरे ठोका। गले में। उसने गैग किया। आँखों से पानी की बूँदें निकल आईं।
“उउउह्ह्ह... भैया... अब डालो न... सहन नहीं हो रहा... चूत तड़प रही है...”
मैंने उसे बेड पर लिटाया। पैर फैलाए। लंड चूत के मुँह पर रखा। धीरे से घुसाया। बहुत टाइट। पहली बार पूरा अंदर। दर्द से उसकी आँखें भर आईं। नाखून मेरे पीठ में चुभ गए। होठ काट लिए उसने।
“आह्ह्ह... दर्द हो रहा है... धीरे... थोड़ा निकालो... अह्ह...”
मैंने रुककर फिर से किस किया। थूक मिलाया। फिर धीरे-धीरे धक्के देने शुरू किए। छप-छप की आवाज। अंदर तक। उसकी चूत लंड को जोर से निचोड़ रही थी। गरम और चिकनी दीवारें। मैंने मन में सोचा, “ये चूत कितनी टाइट और गरम है... शादीशुदा औरत से कई गुना मस्त लगेगी।”
“प्रिया... कितनी टाइट है तेरी चूत... आराम से ले... धीरे-धीरे पूरा अंदर जाएगा...”
“आह्ह... और गहरा... हां... दर्द के साथ मजा भी आ रहा है... और...”
धक्के तेज किए। बेड जोर से चरमरा रहा था। क्रिक-क्रिक। उसकी सिसकारियाँ। “आआआह्ह्ह्ह... चोदो... और तेज... फाड़ दो मेरी चूत...”
मैंने पोजिशन बदली। डॉगी स्टाइल। गांड ऊपर की तरफ। धक्के और जोर से। थप-थप उसकी गांड पर। लाल हो गई। मैंने गांड पर थप्पड़ मारे। दो-तीन जोर के।
“आह्ह्ह... भोसड़ी के... और जोर से पेल... मेरी चूत फाड़ डाल... अह्ह...”
दूसरा राउंड मिशनरी। पैर मेरे कंधों पर। बहुत गहरा। हर धक्के पर उसकी आँखें बंद। मुँह खुला। जीभ बाहर निकली हुई। “हां... हां... और... माल अंदर ही डालना... बाहर मत निकालना...”
मैंने जोर से माल अंदर उंडेल दिया। गरम लावा। भर दिया पूरा। निकलते समय सफेद माल टपक रहा था। उसने उंगली से उठाकर चखा। मुँह में ले लिया।
“उम्म... नमकीन है... और चाहिए... फिर से डालो...”
तीसरा राउंड साइड वे में। मैंने पीछे से घुसाया। एक हाथ उसके बूब्स पर जोर से मसल रहा था। दूसरा क्लिट पर घुमा रहा था। धक्के। छप-छप। स्क्विश-स्क्विश। उसकी आवाज पूरी तरह टूट गई।
“आआआ... अजय... और... माल... अंदर ही डाल... गर्भवती कर दे मुझे... अह्ह...”
मैंने फिर से जोर से झड़ दिया। अंदर। दोनों पसीने से पूरी तरह लथपथ। बेड चादर पूरी गीली। कमरे में चूत, माल और पसीने की तेज महक फैल गई थी। एसी की आवाज के बीच सिर्फ हमारी भारी साँसें गूंज रही थीं।
प्रिया मेरे सीने पर लेटी हुई थी। शरीर चिपचिपा। बाल चेहरे पर चिपक गए थे। “अब क्या होगा... घर जाकर... अगर मम्मी को जरा भी शक हो गया तो... सब खत्म...”
“कुछ नहीं होगा। कल फिर मिलेंगे। अगली बार तेरी गांड भी मारूँगा। रो रोज चोदूंगा तुझे। अपनी रंडी बनाकर रखूँगा।”
उसने थोड़ी मुस्कुराहट दी। आँखों में अभी भी डर था पर गहरी संतुष्टि भी। “पागल हो तुम... पर... हां... बहुत सावधानी से करना...”
हमने कपड़े पहने। शरीर अभी भी चिपचिपा लग रहा था। टिश्यू के पूरे पैकेट से साफ किया। बाथरूम में जाकर पानी से धोया। पैंटी में अभी भी माल टपक रहा था। बाहर निकले। ऑटो में बैठे तो उसकी जांघ मेरे जांघ से सट रही थी। अंदर फिर से लंड तन गया। घर पहुँचे। रात को फिर एक ही कम्बल में लेटे। इस बार बिना तकिया के। हाथ उसके बूब्स पर। हल्की फिंगरिंग। लंबी किस। सुबह तक।
“प्रिया... अब रोज रात को... कम्बल के अंदर ही... हल्के-हल्के...”
“हां... पर घर में बहुत हल्के से... ओयो फिर कभी जल्दी...”
मैंने उसे कसकर अपनी तरफ खींच लिया। बाहर पंखा चल रहा था। गली में कुत्ते भौंक रहे थे। अंदर सिर्फ हमारी मिली-जुली साँसें और कभी-कभी निकली दबी सिसकारियाँ।