लेट नाइट ऑफिस में अनन्या मैडम की गीली पैंटी
दरवाज़े पर मीटिंग बोर्ड लगा था। उन्होंने पैंट खोली और मेरा हाथ अपनी गीली पैंटी पर रख दिया। “कोई नहीं आएगा परेश…” उसके बाद जो हुआ वो सिर्फ एक बार नहीं रहा। पूरी कहानी अभी सुनो…
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Paresh
8/8/2026
मेरा नाम परेश है। उम्र अट्ठाईस साल। पुणे की एक मिड-साइज आईटी कंपनी में वेब डेवलपर हूँ। पिछले आठ महीनों से एक बड़े ई-कॉमर्स वेबसाइट के प्रोजेक्ट पर काम चल रहा था। टीम छोटी थी, सिर्फ छह लोग। उनमें से एक थीं श्रीमती अनन्या शर्मा।
सब उन्हें मैडम कहकर बुलाते थे। शादीशुदा, पैंतीस साल की उम्र, एक बेटा स्कूल में पढ़ता था। लेकिन शरीर ऐसा कि कोई बीस-बाईस साल की कुंवारी लड़की लगे। गोरा-चिट्टा चिकना चेहरा, लंबे काले बाल जो हमेशा खुले या हल्के से बाँधे रहते, पतली कमर, और जींस में इतने गोल-टाइट चूतड़ कि देखकर लंड तन जाता। बूब्स मध्यम साइज के लेकिन इतने फर्म कि टी-शर्ट में निप्पल के निशान साफ दिखाई देते। आवाज भी कॉलेज गर्ल जैसी नर्म और मीठी।
हम दोनों को एक ही प्रोजेक्ट दिया गया था। ऑफिस के साइड केबिन में दो टेबल जोड़कर बैठाया गया था। बीच में सिर्फ एक छोटी पार्टीशन।
पहले दिन सुबह ग्यारह बजे हम दोनों कोडिंग कर रहे थे। अचानक मुझे लगा जैसे कोई नरम चीज मेरे बाएँ पैर से छू गई। नीचे देखा तो अनन्या मैडम का नंगा पैर… गुलाबी पॉलिश वाले नाखून, पतली एड़ी, मेरी पैंट की तरफ धीरे-धीरे रगड़ रहा था। मैंने चौंककर ऊपर देखा। वो स्क्रीन पर ही नजर गड़ाए बैठी थीं, चेहरे पर कोई भाव नहीं।
मन में आया संयोग होगा। दस मिनट बाद वही पैर फिर आया। इस बार जानबूझकर मेरी पैंट के ऊपर से ऊपर की तरफ सरकने लगा। घुटने तक पहुँचा तो रुक गया। लंड हल्का सा फूलने लगा।
मैंने धीरे से कहा, “मैडम… आपका पैर…”
वो मुस्कुराईं, आँखें स्क्रीन पर रखीं। “अरे… माफ करना परेश। टेबल के नीचे जगह कम है… खिसक गया होगा।”
लेकिन पैर नहीं हटा। बल्कि और करीब आ गया। मेरे दोनों पैरों के बीच में आकर हल्के-हल्के रगड़ने लगा। मैं कुछ बोल नहीं पाया। सिर्फ कोडिंग करते हुए अंदर ही अंदर लंड को काबू करने की कोशिश करता रहा।
उस दिन घर जाकर दो बार मुठ मारी। अनन्या मैडम के पैर, उनकी पतली टाँगें और वो बेपरवाह मुस्कान याद करके।
दूसरे दिन फिर वही केबिन। ग्यारह बजे के आसपास ऑफिस थोड़ा शांत हुआ तो फिर से वही खेल शुरू हो गया। इस बार उनका पैर सीधा मेरी जांघ के अंदर तक आ गया। पैंट के ऊपर से लंड के पास रगड़ने लगा। मैंने घबराकर उनकी तरफ देखा।
“मैडम… ये… ये ठीक नहीं लग रहा।”
वो पहली बार मुड़ीं। आँखों में हल्की शरारत थी। “क्या ठीक नहीं लग रहा परेश? मैं तो बस आराम से बैठी हूँ। तुम्हारा पैर गर्म लग रहा है… ठंड लग रही थी मुझे।”
मैं चुप रह गया। लंड पूरा तन चुका था। उनका पैर अब जानबूझकर लंड के ऊपर से ऊपर-नीचे करने लगा। धीरे-धीरे, जैसे टेस्ट कर रही हों। माउस पकड़े हुए हाथ काँपने लगे।
“मैडम… ऑफिस में…”
उन्होंने पलभर के लिए आँखें मीच लीं। फिर धीरे से बोलीं, “सावधान रहना। कोई सुन लेगा तो…”
उस दिन आधा घंटा तक मेरे लंड को पैर से सहलाती रहीं। लंच का टाइम होते ही अचानक पैर हटा लिया और सामान्य आवाज में बोलीं, “चलो लंच करते हैं।”
मैं उठ नहीं पाया। लंड इतना सख्त था कि पैंट में टेंट बना हुआ था। उन्होंने जानबूझकर मेरी हालत देखी और हल्के से मुस्कुरा दीं।
तीसरे दिन मैंने तय किया कि आज जवाब दूँगा। जैसे ही उनका पैर आया, मैंने अपना पैर उनके पैर पर रख दिया। उन्होंने हैरानी से देखा लेकिन पैर नहीं हटाया। मैंने धीरे-धीरे उनके पैर को अपने पैरों के बीच दबा लिया और अंगूठे से एड़ी सहलाने लगा।
उनकी साँस थोड़ी तेज हो गई। फिर उन्होंने भी जवाब दिया। इस बार पूरा पैर मेरी जांघ के अंदर घुसा दिया और लंड को पैर की उँगलियों से दबाने लगीं। इतनी मजबूती से कि मुझे सिसकारी रोकनी पड़ी।
“मैडम… प्लीज… कोई आ जाएगा…”
“तो क्या हुआ? टेबल के नीचे कौन देखेगा? तुम कोडिंग करो… मैं भी कर रही हूँ।”
उस दिन पहली बार लंड को पैंट के ऊपर से पूरा पकड़ लिया पैर से। ऊपर-नीचे किया, दबाया, छोड़ा। मैं लगभग झड़ने ही वाला था कि अचानक बाहर से आवाज आई। उन्होंने तुरंत पैर हटा लिया।
रात को घर पर सोचा – ये औरत पागल है। शादीशुदा है, बच्चा है, फिर भी ऑफिस में पैरों से लंड सहला रही है। लेकिन लंड ने कहा – कल फिर से खेलना है।
चौथे दिन प्रोजेक्ट में बग आ गया। हमें लेट बैठना पड़ा। शाम के सात बज गए। ऑफिस में सिर्फ हम दोनों बचे थे। केबिन का दरवाजा बंद था।
अनन्या मैडम ने अचानक कुर्सी घुमाई और मेरे सामने आकर बैठ गईं। “परेश… तुम बहुत अच्छा कोड लिखते हो। लेकिन आज… आज कुछ और बात करनी है।”
मैंने घबराकर पूछा, “क्या मैडम?”
वो कुर्सी से उठीं और मेरे पास आईं। टेबल के किनारे बैठकर अपना एक पैर मेरी गोद में रख दिया। नंगे पैर। “तुम रोज मेरे पैर को सहलाते हो… आज मैं तुम्हारा सहलाऊँ?”
मैंने हाथ बढ़ाकर उनका पैर पकड़ लिया। नरम, ठंडा, हल्की खुशबू। हल्के से मालिश शुरू की। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। “उम्म… अच्छा लग रहा है…”
फिर अचानक उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर अपनी जांघ पर रख दिया। जींस के ऊपर। “और ऊपर… हल्के से…”
मैंने जांघ सहलाई। वो और करीब आ गईं। मेरा हाथ अब उनकी चूत के पास था। जींस के ऊपर से गर्माहट महसूस हो रही थी। उन्होंने खुद मेरा हाथ दबाया।
“परेश… दरवाजा लॉक है। कोई नहीं आएगा।”
मैंने हिम्मत करके उनका जींस का बटन खोला। धीरे से जिप नीचे की। अंदर काला लेस वाला पैंटी। उँगली पैंटी के ऊपर से फेरी। गीली हो चुकी थी।
“मैडम… आप… इतनी…”
उन्होंने मेरा सिर पकड़कर अपने होठों से लगा लिया। पहला किस बहुत भूखा था। जीभ अंदर तक। थूक का आदान-प्रदान। मैंने उनके बूब्स दबाने शुरू किए। टी-शर्ट के ऊपर से निप्पल सख्त हो चुके थे।
अचानक उन्होंने खुद को पीछे खींचा। “नहीं… ये गलत है परेश। मेरी शादी हुई है… बेटा है… मैं… मैं ये नहीं कर सकती।”
मैंने हाथ छोड़ दिए। लंड तना हुआ था, साँसें उखड़ी हुईं। वो खड़ी होकर कपड़े ठीक करने लगीं। आँखों में पानी था।
“माफ करना। मैं… मैं पागल हो गई थी। कल से नॉर्मल रहेंगे। प्लीज।”
उस रात तीन बार मुठ मारी। गुस्से में, हताशा में, और लस्ट में।
पाँचवें दिन उन्होंने पूरी तरह नॉर्मल बिहेव किया। पैर भी नहीं छुआ। बात भी सिर्फ ऑफिशियल। लेकिन शाम को जब सब चले गए तो फिर से वही कुर्सी घुमाई।
“परेश… कल रात मैं सो नहीं पाई। तुम्हारे बारे में सोचती रही। ये गलत है… बहुत गलत है। लेकिन… लेकिन शरीर नहीं मान रहा।”
मैंने उनकी तरफ देखा। आँखों में लस्ट और ग्लट दोनों साफ थे। मैं उठा और उनके पास गया। इस बार खुद उनका हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया। पैंट के ऊपर से।
“मैडम… आप भी नहीं मान रही होंगी। आज फैसला कर लो। या तो ये खेल यहीं खत्म… या फिर…”
उन्होंने आँखें बंद कीं और लंड को मजबूती से दबाया। “आज… आज रात मेरे घर आओ। पति दिल्ली गए हैं तीन दिन के लिए। बेटा नानी के पास है। सिर्फ… सिर्फ एक बार। उसके बाद कभी नहीं।”
मैंने सिर हिलाया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
रात नौ बजे उनके सोसाइटी पहुँचा। उन्होंने खुद दरवाजा खोला। नाइटगीन पहनी हुई… इतनी पतली कि बूब्स और निप्पल साफ दिख रहे थे। बाल खुले। “अंदर आ जाओ… जल्दी।”
दरवाजा बंद होते ही उन्हें दीवार से सटा दिया। गहरा किस। हाथ नाइटगीन के अंदर। नंगे बूब्स। इतने सॉफ्ट और भारी। निप्पल मुँह में ले लिए। उन्होंने सिर पीछे कर लिया। “आह्ह… धीरे… दाँत मत लगाना…”
नाइटगीन ऊपर सरका दी। पूरी नंगी। शरीर देखकर लंड फटने को हो गया। गोरा बदन, छोटे काले बालों वाली चूत, गोल चूतड़। बिस्तर पर लिटा दिया।
फिर शुरू हुआ वो लंबा फोरप्ले।
पहले लंबे-लंबे किस। थूक पिलाते हुए। फिर बूब्स। दोनों निप्पल को बारी-बारी से चूसा, हल्के दाँत लगाए, जीभ से फेरा। वो तड़पने लगीं। “परेश… बहुत अच्छा लग रहा है… और करो…”
नीचे सरका। जांघें फैलाईं। चूत की खुशबू दिमाग चकरा गई। पहले हल्के से चाटा। फिर जीभ अंदर तक घुसा दी। उन्होंने मेरे बाल पकड़ लिए। “आआआह्ह्ह… जीभ… और अंदर… आह्ह्ह…”
दो उँगलियाँ अंदर डालीं। बहुत टाइट। गीली। उँगलियाँ अंदर-बाहर करते हुए चूत चाटता रहा। वो कमर उठा-उठाकर मेरी जीभ पर रगड़ने लगीं। “परेश… मैं… मैं आने वाली हूँ… रुको मत…”
तेज चाटा। उँगलियाँ और तेज कीं। वो काँपते हुए झड़ गईं। चूत से पानी निकला। सब चाट लिया।
फिर वो उठ बैठीं। मेरे लंड को निकाला। इतना सख्त कि नसें फूली हुईं। पहले चाटा, फिर मुँह में ले लिया। गले तक। ग्लप-ग्लप की आवाज। मैंने बाल पकड़कर धीरे-धीरे पेलना शुरू किया। आँखों में आँसू लेकर भी चूसती रहीं।
“मैडम… आपकी चूत में डालूँ?”
उन्होंने लंड मुँह से निकाला। “डालो… आज रात पूरी चोदो मुझे। कल के बारे में बाद में सोचेंगे।”
उन्हें पेट के बल लिटाया। चूतड़ ऊपर किए। लंड चूत पर लगाकर धीरे से धक्का मारा। इतनी टाइट कि सिर्फ आधा ही गया। उन्होंने तकिया दबा लिया। “आह्ह्ह… दर्द… धीरे… बहुत मोटा है तुम्हारा…”
रुका। फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर तक घुसा दिया। एकदम गर्म, गीली दीवारें लंड को कस रही थीं। धीरे-धीरे धक्के शुरू किए। हर धक्के के साथ छप-छप की आवाज। उनके चूतड़ थप-थप कर रहे थे।
“आआआह्ह्ह… परेश… और तेज… पूरी चूत फाड़ दो… आह्ह्ह…”
कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। बिस्तर चरमरा रहा था। उनकी सिसकारियाँ पूरे कमरे में गूँज रही थीं। एक हाथ से बाल पकड़े, दूसरे से बूब्स मसल रहे थे।
ये चूत कितनी टाइट है… पति शायद कभी ऐसे नहीं चोदता होगा… आज इसकी कुंवारी जैसी चूत फाड़ दूँगा।
बीस मिनट तक लगातार धक्के मारने के बाद लंड बाहर निकाला। उन्हें घुमाकर मिशनरी में लिटाया। पैर कंधों पर रखे और फिर से घुसा दिया। इस बार और गहरा। उनके मुँह से सिर्फ आआआह्ह्ह और हां-हां निकल रहा था।
“मैडम… अंदर छोड़ूँ?”
“छोड़ो… अंदर ही छोड़ो… आज… आज कुछ नहीं सोचना… आआआह्ह्ह…”
आखिरी जोरदार धक्के मारे और लंड चूत के अंदर ही झड़ गया। गर्म माल की धारें अंदर फूट रहीं थीं। वो भी मेरे नीचे काँपते हुए झड़ गईं।
हम दोनों पसीने से लथपथ लेटे रहे। कुछ देर चुप्पी रही। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “परेश… ये सिर्फ आज रात की बात थी। कल से… कल से नॉर्मल। प्लीज।”
मैंने उनके माथे पर किस किया। “ठीक है मैडम। लेकिन शरीर तो याद रखेगा न…”
उन्होंने आँखें बंद कर लीं। आँसू बह रहे थे। ग्लट साफ दिख रहा था। लेकिन चूत से मेरा माल अभी भी रिस रहा था।
दूसरी राउंड एक घंटे बाद शुरू हुई। इस बार उन्होंने खुद लंड को चूसकर फिर से खड़ा किया और ऊपर बैठ गईं। राइडिंग। उनके बूब्स मेरे मुँह में। नीचे से जोर-जोर से धक्के मारे। उनकी गांड मेरे हाथों में।
“आह्ह्ह… परेश… मेरी गांड भी दबाओ… और जोर से… फाड़ दो आज… आआआह्ह्ह…”
एक उँगली उनकी गांड में डाल दी। वो पागल हो गईं। और तेज उछलने लगीं। दोनों फिर से झड़ गए।
सुबह चार बजे जब निकल रहा था तो उन्होंने दरवाजे पर खड़े होकर कहा, “परेश… ये गलत था। बहुत गलत। लेकिन… लेकिन तुम्हारे बिना अब… अब शरीर नहीं मानेगा शायद।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ उनके होठों पर एक लंबा किस किया और निकल गया।
अगले दिन ऑफिस में हम दोनों ने नॉर्मल बिहेव किया। लेकिन टेबल के नीचे उनके पैर ने फिर से मेरे पैर को छुआ। हल्के से। जैसे कह रहा हो – ये खेल अभी खत्म नहीं हुआ।
और सच में… खत्म नहीं हुआ था।
अगले दिन ऑफिस में सब कुछ नॉर्मल दिख रहा था। अनन्या मैडम ने मुझे देखकर सिर्फ हल्की मुस्कान दी और अपने लैपटॉप में व्यस्त हो गईं। लेकिन टेबल के नीचे उनका पैर फिर से आया। इस बार सिर्फ मेरे पैर से सटाकर रखा। कोई रगड़ नहीं, कोई दबाव नहीं। बस छूकर बैठी रहीं। जैसे याद दिला रही हों कि कल रात हुआ था।
दोपहर बाद जब चारों तरफ लोग व्यस्त थे, उन्होंने धीरे से मेरी तरफ देखा। “रात को… फिर आ सकते हो? पति अभी भी दिल्ली में हैं।”
मैंने सिर हिलाया। दिल जोर से धड़क उठा।
रात आठ बजकर चालीस मिनट पर मैं फिर उनके फ्लैट पहुँचा। इस बार उन्होंने दरवाजा खोलते ही मुझे अंदर खींच लिया और पीठ के बल दरवाजे से सटा दिया। गहरा, भूखा किस। जीभ एक-दूसरे के मुँह में। हाथ उनके नाइटगाउन के अंदर चले गए। आज नाइटगाउन के नीचे कुछ भी नहीं था।
“परेश… कल रात के बाद से शरीर सुलग रहा है। दिन भर तुम्हारा लंड याद आ रहा था।”
मैंने उन्हें उठाकर बिस्तर पर ले जाया। इस बार कोई हिचकिचाहट नहीं थी शुरुआत में। नाइटगाउन उतारकर फेंक दी। पूरी नंगी अनन्या मैडम। गोरा बदन, तने हुए बूब्स, और चूत जो कल रात के माल से अभी भी हल्की सूजी हुई लग रही थी।
मैंने पहले उनकी चूत चाटी। कल की तरह नहीं, आज और गहराई से। जीभ को अंदर तक घुसाकर दीवारों को चाटा। उन्होंने मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़ रखा था। “आआआह्ह्ह… जीभ वहाँ… हाँ… वही जगह… आह्ह्ह…”
जब वो अच्छी तरह गीली हो गईं तो मैंने लंड निकाला और सीधा चूत में धकेल दिया। आज इतनी आसानी से घुस गया जैसे कल की चुदाई ने रास्ता बना दिया हो। दोनों सिसक उठे।
“मैडम… आज तुम्हारी चूत और भी नरम लग रही है।”
“क्योंकि… क्योंकि कल तुमने इसे अच्छी तरह चोदा था… अब और चोदो… जोर से…”
मैंने उनके पैर कंधों पर रखे और गहरे-गहरे धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ छप-छप की गीली आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। उनके बूब्स ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और दाँतों से हल्का काटा।
बीस-पच्चीस मिनट तक इसी पोजीशन में चोदने के बाद मैंने लंड बाहर निकाला। उन्हें घुमाकर कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। चूतड़ मेरे सामने। गोल, नरम, और बीच में गांड की पतली दरार।
मैंने पहले चूत में फिर से लंड डालकर जोर-जोर से पेलना शुरू किया। उनके चूतड़ थप-थप की आवाज कर रहे थे। फिर अचानक लंड बाहर निकालकर गांड की दरार पर रख दिया।
“मैडम… यहाँ…?”
वो पलभर के लिए सहम गईं। “परेश… मैंने… मैंने कभी नहीं किया। पति ने भी नहीं… दर्द होगा।”
मैंने थूक लगाकर लंड पर और गांड पर भी लगाया। फिर धीरे से दबाव डाला। सिर्फ टिप अंदर गई। उन्होंने तकिया मुँह में दबा लिया। “आह्ह्ह… दर्द… रुको… धीरे…”
मैं रुका। फिर बहुत धीरे-धीरे और अंदर धकेलने लगा। उनकी गांड इतनी टाइट थी कि लंड को कसकर पकड़ रही थी। आधा अंदर जाने के बाद मैंने रुककर उनकी कमर सहलाई।
“बस… थोड़ा और… फिर मजा आएगा।”
पूरा लंड जब उनकी गांड में समा गया तो दोनों की साँसें उखड़ गईं। मैंने पहले बहुत धीरे-धीरे धक्के शुरू किए। हर धक्के के साथ उनकी सिसकारी बदलती जा रही थी। दर्द से मजे की तरफ।
“आआआह्ह्ह… परेश… गांड… फट रही है… लेकिन… लेकिन मत निकालो… और अंदर… आह्ह्ह…”
मैंने रफ्तार बढ़ाई। अब छप-छप की जगह गांड की टाइट आवाज आ रही थी। उनके बूब्स को नीचे से मसलते हुए जोर-जोर से पेल रहा था। वो हाथ पीछे करके मेरी जांघ पकड़ने लगीं।
“और तेज… मेरी गांड चोदो… आज पूरी फाड़ दो… आआआह्ह्ह…”
मैंने कमर पकड़कर असली स्पीड पकड़ी। बिस्तर चरमरा रहा था। उनकी गांड लाल हो चुकी थी। बीस मिनट बाद जब मैंने महसूस किया कि झड़ने वाला हूँ तो पूछा, “अंदर छोड़ूँ मैडम?”
“हाँ… गांड में ही छोड़ो… सब… आआआह्ह्ह…”
मैंने आखिरी जोरदार धक्के मारे और गर्म माल उनकी गांड के अंदर उड़ेल दिया। इतना कि बाहर भी रिसने लगा। वो भी मेरे नीचे काँपते हुए झड़ गईं। चूत से पानी की धारा निकल रही थी।
हम दोनों ढेर होकर गिर पड़े। पसीना, माल, और थकान। कुछ देर बाद उन्होंने धीरे से कहा, “परेश… अब मेरी गांड भी तुम्हारी हो गई। पति को कैसे मुँह दिखाऊँगी…”
मैंने उनके बाल सहलाए। “मत दिखाओ। जब तक मैं हूँ, तुम्हारी गांड और चूत दोनों की जिम्मेदारी मेरी।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरे सीने पर सिर रखकर लेट गईं। आँखों में फिर वही ग्लट था, लेकिन शरीर मेरे शरीर से चिपका हुआ था।
तीसरी रात और भी अलग थी। इस बार उन्होंने खुद कहा कि ऑफिस में ही कुछ करना है। दोपहर के बाद जब ज्यादातर लोग मीटिंग में थे, हम दोनों केबिन में अकेले थे। दरवाजे पर “मीटिंग इन प्रोग्रेस” का बोर्ड लगा दिया था।
अनन्या मैडम ने कुर्सी से उठकर मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गईं। पैंट का बटन खोला, लंड निकाला और मुँह में ले लिया। ऑफिस की कुर्सी पर बैठे-बैठे मेरा लंड उनकी गर्दन तक जा रहा था। ग्लप-ग्लप की आवाज हल्की थी, लेकिन खतरे का मजा अलग था।
“अगर कोई खटखटा दे… तो…”
मैंने उनके बाल पकड़कर और गहरा धकेल दिया। “तो तुम लंड मुँह में लेकर ही दरवाजा खोलना मैडम।”
वो और जोश में आ गईं। लंड को इतनी तेज चूसा कि मैं जल्दी झड़ने वाला था। मैंने उन्हें उठाया, टेबल पर लिटाया, जींस और पैंटी एक साथ नीचे की और खड़े-खड़े चूत में लंड घुसा दिया।
टेबल हिल रही थी। उनके मुँह पर मेरा हाथ था ताकि सिसकारी दब जाए। “उउउह्ह्ह… परेश… ऑफिस में… पागल हो गए हो…”
मैंने जोर-जोर से पेलना जारी रखा। हर धक्के के साथ टेबल की हल्की आवाज। बाहर से लोगों की बातें सुनाई दे रही थीं। खतरे ने मजे को कई गुना बढ़ा दिया था।
जब झड़ने का टाइम आया तो मैंने लंड बाहर निकालकर उनके मुँह में डाल दिया। उन्होंने सारा माल निगल लिया। आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर संतुष्टि।
“पागल… तुम मुझे पूरी तरह बर्बाद कर दोगे परेश।”
मैंने उनके होठ पोंछे। “बर्बाद नहीं… अपनी बना रहा हूँ मैडम।”
उसके बाद की रातें नियमित हो गईं। कभी घर पर, कभी ऑफिस के लेट नाइट्स में। उनकी गांड अब आसानी से लंड ले लेती थी। कभी-कभी वो खुद गांड में डालने को कहतीं। चूत और गांड दोनों में बारी-बारी से माल भरता था।
लेकिन हर रात के अंत में वही बात दोहराई जाती। “ये अंतिम बार है परेश… कल से बंद। पति आने वाले हैं…”
और अगले दिन फिर से टेबल के नीचे उनका पैर मेरे पैर से सट जाता।
एक हफ्ते बाद जब उनके पति दिल्ली से वापस आए, तो अनन्या मैडम ने मुझे मैसेज किया –
“रात को मत आना। पति घर पर हैं। लेकिन… ऑफिस में टेबल के नीचे वाला खेल जारी रख सकते हो।”
मैंने मुस्कुराते हुए रिप्लाई किया –
“जैसी आज्ञा मैडम।”
और अगले दिन जब हम दोनों केबिन में बैठे, उनका पैर फिर से आया। इस बार सीधा मेरे लंड पर। पैंट के ऊपर से दबाते हुए।
खेल अभी खत्म नहीं हुआ था। बल्कि अब और खतरनाक होने वाला था