पाँच साल की प्यास… एक रात में
हर रात खुद के हाथों से अधूरी संतुष्टि। फिर वो शुक्रवार। रोहन की उँगलियाँ अंदर, जीभ क्लिटोरिस पर, और पहला ऑर्गेज्म इतना तेज़ कि शरीर काँप उठा। उसके बाद दूसरा, तीसरा, चौथा… बेडरूम, बाथरूम, रसोई—हर जगह। सुबह चार बजे तक दोनों नंगे, पसीने और रस में लिपटे सो गए।
SEX STORIES IN HINDI
Raj
8/24/2026
प्रिया शर्मा की जिंदगी पिछले पाँच साल से एक ही लय में चल रही थी। सुबह छह बजे अलार्म, योग के बीस मिनट, नहा-धोकर ऑफिस, शाम को सात बजे घर, खाना, टीवी, और फिर वो बड़ा खाली बिस्तर। पति राहुल दुबई में था। वीडियो कॉल पर मुस्कुराता, “जल्दी आऊँगा” कहता, और काट देता। प्रिया की उम्र उनतीस थी, शरीर अभी भी जवान और भूखा। गोरा रंग, लंबे घने बाल, भारी स्तन, पतली कमर, और जाँघें जो साड़ी में भी अपनी गोलाई छिपा नहीं पाती थीं। लेकिन रातें अकेली थीं। कभी-कभी वह अपने ही हाथों से खुद को सहलाती, निप्पल कसे महसूस करती, उँगली अंदर ले जाती, लेकिन संतुष्टि अधूरी रह जाती। सिर्फ और प्यास बढ़ जाती।
ऊपर वाले फ्लैट में रोहन मल्होत्रा रहता था। बत्तीस साल, लंबा कद, चौड़े कंधे, छाती पर हल्के काले बाल, और आवाज़ में एक गहरी गर्माहट। दोनों की मुलाकात तीन महीने पहले लिफ्ट में हुई थी। फिर पानी के बिल पर, फिर लाइट जाने पर। धीरे-धीरे बातें बढ़ीं। कभी बालकनी में सिगरेट, कभी रात के खाने की थाली, कभी सिर्फ चुपचाप बैठकर बारिश देखना। हर मुलाकात में हवा भारी होती जा रही थी। प्रिया की साँसें रोहन के पास आने पर बदल जातीं। रोहन की नज़रें अक्सर उसके गले पर, साड़ी के पल्लू के नीचे, या जाँघों के उस मोड़ पर ठहर जातीं।
उस शुक्रवार की शाम सब कुछ बदल गया।
अगस्त की उमस। आसमान में काले बादल। प्रिया ऑफिस से थककर लौटी। बाल खुले थे, मेकअप हल्का मिटा। उसने हल्की गुलाबी कॉटन साड़ी पहनी, ब्लाउज़ गहरा, क्लीवेज थोड़ा ज्यादा। बालकनी में खड़ी थी कि ऊपर से रोहन की आवाज़ आई—
“प्रिया, चाय पीोगी? अदरक वाली बनी है।”
पाँच मिनट बाद वह दरवाज़े पर था। गीले बाल, सफेद टी-शर्ट जो छाती पर चिपक रही थी, काला लोअर। हाथ में दो कप। अंदर आया। बैठे। बातें होने लगीं—ऑफिस की थकान, दुबई की दूरी, अकेलेपन की रातें।
“तुम इतने दिन कैसे काट लेती हो?” रोहन ने अचानक पूछा। आवाज़ में कोई हल्की बात नहीं थी।
प्रिया ने कप नीचे रखा। आँखें उसकी आँखों में। “आदत डाल ली है। लेकिन रातें… रातें बहुत लंबी हो जाती हैं। बिस्तर ठंडा लगता है।”
रोहन चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “मेरी भी।”
खामोशी छा गई। पंखे की आवाज़, बाहर हल्की गरज। प्रिया का दिल जोर से धड़क रहा था। रोहन ने हाथ बढ़ाया। उँगलियाँ उसकी हथेली पर रखीं। गर्माहट फैली। प्रिया ने हाथ नहीं हटाया। बल्कि अपनी उँगलियाँ उसकी उँगलियों में फँसा लीं। दोनों की हथेलियाँ पसीने से गीली हो रही थीं।
रोहन और करीब खिसका। उसका घुटना प्रिया के घुटने से छू गया। साँसें मिलने लगीं। उसने दूसरा हाथ उठाकर प्रिया के गाल पर रखा। अंगूठे से होंठ के किनारे को सहलाया। धीरे-धीरे, बहुत धीरे।
“अगर मैं चूम लूँ… तो बुरा तो नहीं लगेगा?”
प्रिया ने आँखें बंद कर लीं। जवाब में सिर्फ गर्दन थोड़ी आगे की। होंठ हल्के से खुले।
पहला चुंबन बहुत नरम था। सिर्फ होंठों का स्पर्श। गरम, थोड़ा नम। फिर दबाव बढ़ा। रोहन की जीभ ने प्रिया के होंठ धीरे से खोले। दोनों की जीभ मिलीं। पहले हिचकिचाती हुई, फिर भूख से। लार मिली। हल्की चप-चप की आवाज़ आने लगी। रोहन का हाथ प्रिया की कमर पर फिसला, फिर पीठ पर। ब्लाउज़ के ऊपर से रीढ़ की हड्डी सहलाई। उँगलियाँ ऊपर-नीचे।
प्रिया की साँसें तेज़ हो गईं। उसने रोहन के बालों में उँगलियाँ फँसा लीं और उसे और करीब खींच लिया। चुंबन गहरा होता गया। जीभ और अंदर, और जोर से। रोहन ने प्रिया को अपनी गोद में खींच लिया। साड़ी का पल्लू सरक गया। ब्लाउज़ तनाव में आ गया। स्तनों का आकार साफ दिखने लगा।
रोहन के होंठ गर्दन पर चले गए। पहले हल्का चुंबन, फिर जीभ से लंबा चाटना, फिर दाँतों से हल्का काटना। प्रिया की गर्दन में सिहरन दौड़ गई। उसकी आवाज़ पहली बार निकली—
“आह्ह…”
“और?” रोहन ने कान के पास फुसफुसाया। गर्म साँस कान के अंदर गई।
“और… मत रोको…” प्रिया की आवाज़ काँप रही थी।
रोहन ने ब्लाउज़ के हुक एक-एक करके खोले। चार हुक। हर हुक के खुलते ही प्रिया की साँस रुक जाती। ब्लाउज़ उतरा। काली ब्रा, पतले फीते। रोहन ने फीते खींचे। स्तन बाहर आ गए—भारी, गोल, निप्पल पहले से कड़े और थोड़े गहरे रंग के। उसने एक निप्पल मुँह में लिया। जीभ से गोल-गोल घुमाया, फिर जोर से चूसा, हल्का काटा।
“ओह्ह… रोहन… धीरे… आआह…” प्रिया की कमर अपने आप उछली।
दूसरा स्तन भी उसी हाल में। दोनों हाथों से दबाते हुए, मुँह से काम करते हुए। कभी एक, कभी दूसरा। प्रिया की उँगलियाँ रोहन के सिर को और नीचे धकेल रही थीं। उसकी साँसें हाँफने लगीं। निप्पल इतने संवेदनशील हो गए थे कि हर चाटने और चूसने पर बिजली सी दौड़ जाती। रोहन ने दाँतों से हल्का खींचा तो प्रिया की आवाज़ और तेज़ हो गई—
“आआाह्ह… मत छोड़ो… और…”
रोहन ने साड़ी खोली। पेटीकोट खींचा। अब सिर्फ पैंटी। काली लेस वाली। बीच का हिस्सा पहले से गहरा और गीला हो चुका था। रोहन ने उँगली से छुआ। नमी साफ महसूस हुई। उसने पैंटी के किनारे को खींचकर अंदर देखा।
“इतनी जल्दी इतनी गीली… सिर्फ चुंबन और स्तन चूसने से?”
प्रिया शर्म से मुँह फेरने वाली थी, लेकिन रोहन ने उसका चेहरा पकड़ लिया। “देखो मुझे। तुम्हारा शरीर कितना ईमानदार है। झूठ नहीं बोल रहा।”
उसने पैंटी धीरे-धीरे नीचे खींची। प्रिया की योनि पूरी तरह नंगी हो गई—मुलायम घने बाल, गुलाबी भीतरी पंखुड़ियाँ जो पहले से थोड़ी सूजी हुई थीं, और बीच से चमकता हुआ पतला, चिपचिपा रस। रोहन घुटनों के बल बैठ गया। दोनों जाँघें फैलाईं। पहले सिर्फ गर्म साँस छोड़ी। साँस योनि पर पड़ी तो प्रिया का पूरा शरीर सिहर उठा।
“आह्ह… क्या कर रहे हो…”
फिर जीभ निकली। पहला चाटना बहुत लंबा और बहुत धीमा था—नीचे से ऊपर तक, पूरे स्लिट पर, क्लिटोरिस तक। प्रिया की कमर अपने आप उठ गई।
“आआाह्ह…”
रोहन ने दोनों हाथों से जाँघों को और फैलाया। जीभ को अंदर धकेला। चक्कर लगाया। फिर निकाली और क्लिटोरिस पर रुकी। चूसा। हल्का काटा। फिर फिर से चूसा। प्रिया की आवाज़ें अब साफ और लंबी आने लगीं।
“ओह्ह… वहाँ… हाँ… ऐसे ही… आआाह… रोहन… और जोर से… उम्मम…”
दो उँगलियाँ अंदर गईं। गीलापन इतना था कि तुरंत आवाज़ आने लगी—चप-चप-चप। उँगलियाँ अंदर-बाहर, मुड़ती हुई, ऊपरी दीवार को सहलाती हुई। जीभ लगातार क्लिटोरिस पर घूम रही थी। प्रिया के नाखून सोफे के कपड़े में धँस गए। उसकी टाँगें काँप रही थीं। कमर बार-बार उठ रही थी।
“मैं… आ… रही हूँ… रुको मत… आआाह्ह्ह… रोहन… आआाह…”
पहला ऑर्गेज्म तेज़ लहर की तरह आया। योनि ने उँगलियों को जोर से कस लिया। रस और निकल आया—गाढ़ा, चिपचिपा, रोहन की जीभ और ठोड़ी तक। उसने सब चाट लिया। प्रिया का शरीर ढीला पड़ गया। साँसें जोर-जोर से हाँफ रही थीं। आँखों में पानी। माथा पसीने से चमक रहा था।
रोहन खड़ा हुआ। टी-शर्ट उतारी। छाती चौड़ी, पेट सपाट, हल्के बाल। फिर लोअर और अंडरवियर एक साथ। लंड बाहर आया—लंबा, मोटा, नसों से भरा हुआ, सिरे पर पहले से चमकता हुआ प्री-कम। प्रिया ने हाथ बढ़ाया। मुट्ठी में लिया। गर्म, कठोर, धड़कता हुआ। ऊपर-नीचे किया। सिरे से और पानी निकलने लगा।
“मुँह में लो,” रोहन ने धीरे से कहा। आवाज़ में भूख साफ थी।
प्रिया घुटनों पर बैठ गई। पहले जीभ से पूरा चाटा—नीचे से ऊपर, अंडकोष तक, फिर वापस सिरे पर। फिर सिरे को होंठों में लिया। धीरे-धीरे गहरा। गला भर गया। आँखों में पानी आ गया लेकिन उसने रोका नहीं। लार टपकने लगी। गीली आवाज़ें—स्लर्प… स्लर्प… स्लर्प। रोहन के हाथ उसके बालों में थे। कभी धीरे धक्का देता, कभी रुककर मजा लेता।
“बस… इतना… बहुत अच्छा लग रहा है… और गहरा… हाँ…”
थोड़ी देर बाद उसने प्रिया को उठाया। सोफे पर लिटाया। जाँघें फैलाईं। लंड का सिरा योनि के मुँह पर रखा। धीरे-धीरे धकेला। पहले सिर्फ आधा। प्रिया की आँखें बड़ी हो गईं, मुँह खुला।
“आह्ह्ह… इतना… मोटा… धीरे…”
फिर पूरा अंदर। दोनों थोड़ी देर रुके। अंदर की गर्मी, धड़कन, पूरा भरा हुआ अहसास। प्रिया की योनि धड़क रही थी। रोहन ने हिलेना शुरू किया—पहले बहुत धीमा, लंबा-लंबा। हर धक्के पर प्रिया के स्तन काँपते। उसकी आवाज़ें धीरे-धीरे तेज़ होती गईं।
“ओह्ह… हाँ… और गहरा… वहाँ… आआाह… रोहन… और… उम्मम…”
गति बढ़ी। जाँघों की टक्कर,
गीली चप-चप की आवाज़, प्रिया के नाखून रोहन की पीठ पर। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था। प्रिया ने पैर उसकी कमर पर लपेट लिए। एड़ियों से दबाया, और करीब खींचा।
“तेज़… और तेज़… आआाह्ह… मत रोको…”
दूसरा ऑर्गेज्म और जोरदार था। योनि ने लंड को निचोड़ लिया। रस और बहने लगा—जाँघों तक। रोहन ने गति और बढ़ाई। कुछ और गहरे धक्कों के बाद वह बाहर निकला और प्रिया के पेट, नाभि और स्तनों पर गरम-गरम वीर्य छोड़ दिया। सफेद धारें फैल गईं, निप्पल तक बह गईं।
दोनों हाँफ रहे थे। रोहन प्रिया के ऊपर गिर गया। दोनों की साँसें मिल रही थीं। बाहर बारिश जोरों पर थी। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज़ और उनकी भारी साँसें।
लेकिन रात अभी शुरू ही हुई थी।
थोड़ी देर आराम के बाद प्रिया ने खुद रोहन का हाथ पकड़ा और उसे बेडरूम में खींच लिया। बिस्तर पर लिटाया। इस बार वह ऊपर थी। लंड को फिर से मुँह में लिया—लंबे समय तक, धीरे-धीरे, गहरी। जब वह फिर से पूरी तरह कठोर हो गया तो उस पर सवार हो गई। धीरे-धीरे पूरा निगल लिया। कमर घुमाने लगी—पहले गोल, फिर आगे-पीछे। स्तन रोहन के मुँह में झूल रहे थे।
“चूसो… हाँ… जोर से चूसो… आआाह…” प्रिया की आवाज़ अब बिल्कुल मुक्त थी।
रोहन ने दोनों स्तन दबाए, निप्पल काटे, चूसे, जीभ घुमाई। प्रिया की गति तेज़ होती गई। गीली आवाज़ें कमरे में गूँज रही थीं—थप-थप-थप। उसकी आँखें बंद, होंठ खुले, माथा पसीने से चमकता, बाल चेहरे पर चिपक रहे थे।
“आह्ह… ओह्ह… मैं पागल हो जाऊँगी… और… और तेज़… आआाह्ह…”
तीसरा ऑर्गेज्म आता-आता रह गया। शरीर काँप रहा था। रोहन ने उसे पलटा। कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। पीछे से धक्के। एक हाथ आगे जाकर क्लिटोरिस को सहला रहा था, दूसरा बालों को पकड़े हुए।
“बोलो… कितना अच्छा लग रहा है… साफ बोलो…”
“बहुत… बहुत अच्छा… आआाह्ह… और जोर से चोदो… हाँ… बस ऐसे… आआाह… उम्मम… और तेज़…”
कमरा गूँज रहा था। बिस्तर चरमरा रहा था। प्रिया की योनि से रस जाँघों तक बह रहा था, चादर गीली हो रही थी। रोहन के हर धक्के पर वह और गीली होती जा रही थी। आवाज़ें अब लगभग चीख जैसी हो गई थीं—लंबी, काँपती हुई।
“आआाह्ह… रोहन… मैं आ रही हूँ… फिर से… आआाह्ह्ह… मत निकालो…”
चौथा ऑर्गेज्म पूरे शरीर को हिला गया। पैर काँप रहे थे, कमर अपने आप धक्के खा रही थी। रोहन ने कुछ और तेज़ धक्के दिए और इस बार अंदर ही छोड़ दिया—गरम, गाढ़ी लहरें। प्रिया का शरीर सिहर रहा था। वह बिस्तर पर गिर गई, साँसें तेज़, शरीर पसीने और रस से चमकता, योनि से मिला-जुला द्रव धीरे-धीरे टपकता।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी। दोनों ने पानी पिया। फिर रोहन ने प्रिया को बाथरूम में ले जाकर शावर के नीचे खड़ा किया। गर्म पानी दोनों पर गिर रहा था। उसने फिर से प्रिया के स्तन चूसे, उँगलियाँ अंदर लीं, और खड़े-खड़े ही फिर से अंदर घुस गया। दीवार के सहारे। पानी और रस मिलकर बह रहे थे। प्रिया की आवाज़ें शावर की आवाज़ में मिल रही थीं—
“आआाह… ओह्ह… और… आआाह्ह…”
सुबह चार बजे तक दोनों थक कर एक-दूसरे की बाँहों में सो गए। नंगे। खुशबू, पसीना, वीर्य और रस की मिली-जुली गंध में लिपटे। चादर पूरी तरह गीली थी।
सुबह जब प्रिया की आँख खुली तो रोहन अभी भी उसके पास था। उसका लंड आधा कठोर, जाँघ से लगा हुआ। प्रिया ने मुस्कुराते हुए उसे हाथ में ले लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी।
रोहन ने आँखें खोलीं। मुस्कुराया।
“फिर से?”
प्रिया ने कोई शब्द नहीं कहा। बस नीचे सरक गई और उसे फिर से मुँह में ले लिया—धीरे-धीरे, गहरी, पूरी तरह।
सुबह की रोशनी पर्दे के किनारे से कमरे में घुस रही थी। प्रिया की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। शरीर में एक मीठी थकान थी। जाँघों के बीच अभी भी गीलापन महसूस हो रहा था। चादर पूरी तरह गंदी और नम थी। रोहन उसके बगल में लेटा था—नंगा, एक हाथ उसकी कमर पर डाले हुए, साँसें गहरी और शांत। उसका लंड जाँघ से लगा हुआ था, आधा कठोर, सुबह की स्वाभाविक अवस्था में।
प्रिया ने धीरे से करवट बदली। रोहन की छाती के बालों पर उँगली फेरने लगी। फिर नीचे की ओर सरक गई। उसने लंड को हाथ में लिया। गर्म और भारी। धीरे-धीरे सहलाने लगी—जड़ से सिरे तक। सिरे पर पहले से ही थोड़ा चिपचिपापन था। प्रिया ने जीभ निकाली और लंबा चाटा। फिर पूरे सिरे को मुँह में ले लिया।
रोहन की साँसें बदल गईं। आँखें अभी भी बंद थीं, लेकिन हाथ प्रिया के बालों में चला गया।
“सुबह-सुबह… इतनी भूखी?” उसकी आवाज़ नींद भरी और गहरी थी।
प्रिया ने जवाब में और गहरा ले लिया। गला भर गया। लार बहने लगी। वह धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगी—कभी सिर्फ सिरा, कभी आधा, कभी लगभग पूरा। गीली आवाज़ें कमरे में गूँजने लगीं—स्लर्प… ग्लक… स्लर्प। रोहन का लंड पूरी तरह कठोर हो गया। नसें उभर आईं।
“आह्ह… प्रिया… ऐसे ही… और गहरा…”
प्रिया ने अंडकोष को भी मुँह में लिया, जीभ घुमाई, फिर वापस लंड पर आ गई। दोनों हाथों से जड़ को पकड़े हुए जोर-जोर से चूसने लगी। रोहन की कमर हिलने लगी। उसने प्रिया के बाल और कसकर पकड़ लिए।
“बस… अब मत चूसो… अंदर आजा…”
प्रिया ऊपर आई। रोहन के ऊपर सवार हो गई। लंड को योनि के मुँह पर रखा। वह अभी भी सुबह के रस से गीली थी। धीरे-धीरे बैठने लगी। पूरा अंदर चला गया। दोनों ने एक साथ लंबी साँस छोड़ी।
“आआाह्ह…” प्रिया की आवाज़ काँप उठी।
वह कमर घुमाने लगी—पहले बहुत धीमा, गोल-गोल। स्तन रोहन के चेहरे के ऊपर झूल रहे थे। रोहन ने दोनों स्तन पकड़ लिए और निप्पल मुँह में ले लिए। जोर से चूसने लगा, दाँतों से हल्का काटने लगा।
“ओह्ह… हाँ… चूसो… आआाह… और जोर से…”
प्रिया की गति बढ़ने लगी। आगे-पीछे, फिर गोल। गीली आवाज़ें तेज़ हो गईं—थप-थप-थप। रस रोहन के पेट तक बहने लगा। प्रिया की आँखें बंद थीं, होंठ खुले, माथा पसीने से चमक रहा था।
“आह्ह… रोहन… इतना गहरा… आआाह्ह… मैं…”
पहला सुबह का ऑर्गेज्म धीरे से लेकिन लंबे समय तक आया। योनि ने लंड को बार-बार निचोड़ा। प्रिया की कमर काँप रही थी। वह रोहन की छाती पर गिर गई, लेकिन हिलना बंद नहीं किया। रोहन ने उसे कसकर पकड़ लिया और नीचे से धक्के देने लगा।
“अब मेरी बारी…”
उसने प्रिया को पलटा। उसके ऊपर आ गया। जाँघें फैलाईं और लंबे-लंबे धक्के देने लगा। हर धक्का गहरा और जोरदार। प्रिया की आवाज़ें फिर से तेज़ हो गईं।
“आआाह… ओह्ह… तेज़… और तेज़… आआाह्ह… मत रोको…”
रोहन ने एक पैर उठाकर अपने कंधे पर रख लिया। कोण और गहरा हो गया। प्रिया की आँखें खुली की खुली रह गईं। मुँह से सिर्फ कराहें निकल रही थीं।
“उम्मम… आआाह… वहाँ… हाँ… बिल्कुल वहाँ… आआाह्ह्ह…”
दूसरा ऑर्गेज्म और तेज़ था। प्रिया के नाखून रोहन की पीठ पर चल गए। शरीर सिहर उठा। रोहन ने कुछ और धक्के दिए और अंदर ही छोड़ दिया। गरम लहरें प्रिया के अंदर फैल गईं। दोनों लंबे समय तक ऐसे ही पड़े रहे—लिपटे हुए, साँसें मिलती हुईं।
दोपहर तक दोनों ने नहा लिया। प्रिया ने सिर्फ रोहन की बड़ी टी-शर्ट पहन रखी थी। नीचे कुछ नहीं। रोहन सिर्फ पैंट में था। रसोई में खड़े-खड़े चाय बनाते समय रोहन के पीछे से आया। हाथ टी-शर्ट के अंदर डाल दिए। स्तन पकड़ लिए। निप्पल सहलाने लगा।
“फिर से?” प्रिया ने मुस्कुराते हुए पूछा, लेकिन आवाज़ में मनाही नहीं थी।
“पूरा दिन…” रोहन ने गर्दन पर चुंबन लिया।
उसने प्रिया को रसोई के प्लेटफॉर्म पर बैठा दिया। टी-शर्ट ऊपर कर दी। स्तन निकाल लिए। लंबे समय तक चूसता रहा—कभी धीरे, कभी जोर से, कभी दाँतों से खींचकर। प्रिया की उँगलियाँ उसके बालों में थीं। आवाज़ें फिर से निकलने लगीं।
“आह्ह… ओह्ह… रोहन… कितनी देर…”
रोहन नीचे गया। जाँघें फैलाईं। प्रिया की योनि अभी भी सुबह के रस और उसके वीर्य से चिपचिपी थी। उसने जीभ से पूरा साफ किया—लंबे-लंबे चाटते हुए। क्लिटोरिस को मुँह में लेकर चूसा। दो उँगलियाँ अंदर ले जाकर तेजी से हिलाने लगा।
“आआाह्ह… बस… वहाँ… आआाह… मैं फिर से…”
प्रिया का तीसरा ऑर्गेज्म रसोई में ही आ गया। पैर काँप रहे थे। उसने रोहन के बाल कसकर पकड़ रखे थे। रस उसकी ठोड़ी तक बह गया।
शाम तक दोनों ने लगभग हर कमरे में कर लिया था। लिविंग रoom के सोफे पर, बालकनी के दरवाज़े के पास (पर्दे बंद करके), यहाँ तक कि स्टडी टेबल पर भी। हर बार फोरप्ले लंबा होता। रोहन प्रिया के पूरे शरीर को चूमता—गर्दन, स्तन, पेट, जाँघें, घुटने, पैर की उँगलियाँ तक। फिर घंटों ओरल। प्रिया भी उतनी ही भूखी थी। वह रोहन के लंड को मुँह में लेकर देर तक रखती, कभी धीरे चूसती, कभी गहरा लेती, कभी सिर्फ जीभ से खेलती।
रात के नौ बजे दोनों फिर से बिस्तर पर थे। इस बार रोहन ने प्रिया को पेट के बल लिटाया। पीछे से उसके बाल एक तरफ किए और गर्दन से लेकर कमर तक चूमते हुए नीचे गया। जाँघों को फैलाया और पीछे से योनि को चाटने लगा। जीभ अंदर तक ले जाकर चक्कर लगाया। प्रिया के मुँह से आवाज़ें निकल रही थीं—तकिये में दबी हुईं।
“आआाह… ओह्ह… क्या कर रहे हो… आआाह्ह…”
रोहन ने दो उँगलियाँ अंदर लीं और क्लिटोरिस को अंगूठे से सहलाने लगा। प्रिया की कमर बार-बार उठ रही थी। रस चादर पर गिर रहा था।
“अब और नहीं सह सकती… अंदर आजा… प्लीज…”
रोहन ने पीछे से प्रवेश किया। पूरा। एक ही धक्के में। प्रिया की आवाज़ निकल गई—
“आआाह्ह्ह…”
वह लंबे-लंबे धक्के देने लगा। एक हाथ आगे जाकर स्तन पकड़े हुए था, दूसरा क्लिटोरिस सहला रहा था। प्रिया की आवाज़ें अब पूरी तरह मुक्त थीं।
“हाँ… ऐसे ही… और जोर से… आआाह… चोदो… जोर से चोदो… आआाह्ह…”
रोहन ने बाल पकड़कर सिर थोड़ा पीछे खींचा। धक्के और तेज़ हो गए। बिस्तर जोर-जोर से चरमरा रहा था। गीली आवाज़ें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। प्रिया का शरीर पसीने से चमक रहा था। रस जाँघों से होते हुए घुटनों तक बह रहा था।
“आआाह्ह… मैं आ रही हूँ… रोहन… आआाह्ह्ह…”
ऑर्गेज्म इतना तेज़ था कि प्रिया के पैर थोड़ी देर के लिए सुन्न हो गए। योनि बार-बार संकुचित हो रही थी। रोहन ने कुछ और धक्के दिए और अंदर ही बिखेर दिया। दोनों एक-दूसरे पर गिर गए।
रात के बारह बजे तक दोनों ने फिर से ऊर्जा जमा ली। इस बार प्रिया ने रोहन को कुर्सी पर बैठाया और खुद उसके ऊपर बैठ गई। आमने-सामने। स्तन उसके मुँह में। कमर जोर-जोर से हिल रही थी। दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे। आवाज़ें मिल रही थीं।
“आह्ह… ओह्ह… प्रिया… इतनी गीली… आआाह…”
“तुम्हारे लिए… सिर्फ तुम्हारे लिए… आआाह्ह… और गहरा…”
वे देर रात तक ऐसे ही जुड़े रहे। कभी धीरे, कभी बेकाबू। कभी चुपचाप सिर्फ साँसें लेते हुए, कभी जोर-जोर से कराहते हुए। चादरें पूरी तरह भीग चुकी थीं। कमरे में सिर्फ उनकी खुशबू और गीली आवाज़ें थीं।
सुबह के तीन बजे जब दोनों आखिरकार थककर सोए तो प्रिया की उँगलियाँ अभी भी रोहन के बालों में थीं। उसके होंठ उसके सीने पर थे। जाँघों के बीच अभी भी गर्म और गीला अहसास था।
बाहर बारिश रुक चुकी थी। कमरे में सिर्फ दो धड़कते दिल और गहरी साँसें बची थीं।